Wednesday, 3 December 2014

परिवर्तन

भारतीय अर्थव्यवस्था हाथी की तरह बड़ी और विशाल है।लेकिन इसको शेर की तरह गतिशील और स्फूर्तिवान करने की जिम्मेदारी सरकार की है।कुछ सरकारी नीतियों में बदलाव की आवश्यकता है। हमारा देश इस वक़्त गरीबी की चुनौती से लड़ने की ताकत बटोरने के अथक प्रयास में लगा हुआ है। इन प्रयासो को एक दिशा आर्थिक नीतियों में सुधार के  माध्यम से ही दी जा सकती है । समय के साथ चुनौतियां भी बदलती है इसलिए कानून बदलने चाहिए । जैसे हम सुविधा अनुसार गर्मी मे हलके  कपडे और ठंडी मे गरम कपडे पहनते है वैसे ही कानून भी समय की मांग के अनुसार बदलना चाहिए,शायद  इसी कारण नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालते ही कठोर निर्णय लेने का फैसला लिया था.।लाल किले के पहले भाषण में ही मोदी ने योजना आयोग की समापत्ति की घोषणा  कर दी और नीति आयोग की पहल की जिसमे उन्होंने सभी राज्यों के मुख्यामंत्री को शामिल करने की बात की हैं क्योकि उनका मानना हैं की जब योजना राज्यों के लिए बनाई जा रही हैं तो उनकी भागीदारी तो बहुत जरूरी  हैं। मोदी सबका साथ सबका विकास के फॉर्मूले को निभाते हुए उन्होंने नीति आयोग का गठन किया हैं। इसकी सफलता और विफलता तो भविष्य  के गोद में हैं लेकिन फिलहाल गरीबो का दर्द कम  होना बाकी है। नरेंद्र मोदी को इन्ही गरीबो के वोट से ही पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का गौरव प्राप्त हुआ है और उनकी पहली प्राथमिकता इनके दुखो को दूर करना होगा। परिवर्तन की शुरुवात तो नरेंद्र मोदी ने की हैं पर  जमींन  पर उसका फल अभी नहीं मिल रहा है।नरेंद्र मोदी ने खुद को शासक नहीं बल्कि सेवक के रूप पेश किया हैं जिससे जनता उनसे ज्यादा की उम्मीद करता हैं। मोदी जल्दबादी में विदेशी कम्पनियो को भारत मैं बढ़ावा दे रहे जिससे देश में थोड़ी असुरक्षा की भावना भी  रही हैं।
        न्यायालय के जजो की नियुक्ति के पैनल में भी सुधर किया गया हैं क्योकि पुराने पद्धति में सिफारिशें और चाटुकारिता का एक सिलसिला सा सुरु हो गया था जो किसी रूप मैं सही नहीं माना  जा सकता।  कानून पर आस्था सिर्फ न्यायालय की वजह से जिन्दा हैं जिसमे अब राजनीती का तड़का लग चुका था जो शायद इस परिवर्तन से सुधर  सके नहीं तो शायद  लोगो का लोकतंत्र पर से विशवास उठ जायेगा। 

No comments:

Post a Comment