Tuesday, 23 December 2014

देश का दुर्भाग्य

हमारे देश का बड़ा दुर्भाग्य हैं की हमें अपने इतिहास को जानने के लिए हमें विदेशो के तरफ देखना पड़ता हैं। हम इतने आलसी है की हमे सब कुछ बना बनाया ही चाहिए। कई बार तो ये विदेशी हमारे इतिहास को तोड़ मरोड़कर पेश करते हैं क्योकि उनका उद्देश्य फूट डालो और  शासन  करो रहता हैं। हमारे यहाँ का विज्ञान और चिकित्सा  यूरोप से  बहुत आगे था। विज्ञान जिस तथ्य को 2014 में समझ पाते हैं वो हमारे यहाँ के ग्रंथो में  आदि काल में ही उसका जिक्र मिलता हैं। हमारे राजनेता कभी भी  उन तथ्यों को संसार के सामने नहीं लाते  हैं। हमारा दर्शन, साहित्य, विज्ञान , चिकित्सा, योग, कला उच्च कोटि के थें  पर हमारे सरकार की उदासीनता के कारन इसका श्रेय अरस्तू प्लेटो जैसे दार्शिनीको को मिल जा रहा हैं जबकि अरस्तू के शिस्य सिकंदर ने खुद माना  था की भारत हर क्षेत्र में आगे हैं।
                                           नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ मैं योग को सम्मान दिलाकर हम भारतीयों को गर्व करने का एक मौका दिया हैं लेकिन अभी बहुत कुछ है जो भारत ने किया हैं जिसका सम्मान  दूसरे राष्ट्र ले रहे हैं जो उन विद्वानो का अपमान हैं जिन्होंने उन सिद्धांतो को प्रतिपादित किया था.लेकिन हमारे देश वालो का दिल बहुत बड़ा  हैं उन्हें इनसे कोई मतलब नहीं है लेकिन भावी पीढ़ी तो  शायद इन्हे भूल ही  क्योकि हमारे  इतिहासकारो ने इन्हे इतिहास में जगह नहीं  सके  राजनेताओ ने उन्हें सम्मान नहीं दिलवा सके। मोदी से आशाये बहुत हैं जिसके तरफ उन्होंने मजबूती से  कदम भी उठाया हैं जिसका परिणाम हैं की भारतीय योग को संसार ने सम्मान दिया हैं और योग दिवस मनाने का फैसला किया  हैं।  कार्ल मार्क्स और मैक्स वेबर जैसे पाश्चात्य संस्कृति के लोग, जो कभी भारत नही आये और न ही उन्होंने भारत का साहित्य पढ़ा, लेकिन आज भारत के शीर्ष शैक्षणिक, सामाजिक और सरकारी संस्थान आजादी के 67 वर्षों बाद भी इनके विचारों से संचालित हो रहे हैं.क्या  हमारे देश की गौरवशाली शिक्षण पद्धति  कमतर हैं जिसने  समूचे संसार को ज्ञान देने की परम्परा की शुरआत की थी।हमें फोबिया रोग है की पाश्चात्य शिक्षण हमें बेहतर इंसान बनता हैं पर वास्तव में हम मात्र नक़ल कर रहे हैं जो किसी भी रूप में उचित नहीं हैं। 

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