हमारे देश को नक़ल करने की आदत है हम हर अच्छी दिखने वाली चीजो को अपने मे उतार लेते है परिणामस्वरूप हम अपनी गौरव साली पुरातन संस्कृति को भूल जाते है.। हमारे देश ने पहली नगरीय सभयता को जनम दिया जिसे पूरा संसार सिंधु घाटी की सभयता के नाम से जानती है। हमने संसार को
पढ़ना सिखाया ,नालंदा विक्रमशिला तक्सीला जैसे विश्व्व विद्यालय हमने दिए। पूरा संसार हमारे यहाँ पढ़ने
आता था। हमारे लिए पूरा संसार ही हमारा घर था। हमारी संस्कृति सबसे सम्पन है जिसमे लोग आज भी अपने माता पिता को अपना भगवान मानते है। औरतो को हम देवी शक्ति का रूप मानते है लेकिन पश्चिमी सभयता के प्रवेश के कारन आज हमारे समाज का विकृत रूप देखने को मिलता है। हम अपने बड़े की इज्जत नहीं करते ,गुरु का सम्मान करते ,औरतो की इज्जत नहीं करते और परिणामस्वरूप बलात्कार चोरी हत्या
जैसे अपराध समाज मे बढ़ रहे है। हमारा युवा भटक रहा है लिए हमे फिर से पीछे चलना होगा। वेदो की और लोटो। हमे दुनिया के पीछे नहीं अपने वेदो के ज्ञान की तरफ बजाना चाहिए क्युकी हमारे पूरवज बड़े ग्यानी थें। हमारा भटकाव हमारे गरावसाली संस्कृति को धूमिल कर रहा हैं। आज आजादी के नाम पैर जिस तरह की अराजकता हैं समाज में की अमीर और अमीर होता जा रहा हैं और गरीब और गरीब। हमारे लोकनृत्य ,संगीत कला सब कुछ अपनी अंतिम साँसे गिण रहा हैं। अंग्रेजो ने हमारे संस्कृतो को बर्बाद किया तो समझ हैं वो हमारे कला को श्रेष्ठ नहीं मानते थें लेकिन अब तो देश आजाद हैं और हमपर हमारा ही सासन हैं तो फिर क्यों हमारे कलाकार मर रहे हैं। उनके सरंक्षण के नाम पर दिखावा होता हैं कभी शिल्प मेला के नाम पर तो कभी किसी दिवस के नाम पर। हमारी सरकार को अपनी संस्कृति का अपमान बंद करना चाहिए अगर वो कुछ कर नहीं सकते तो अपमान तो न करे।
पढ़ना सिखाया ,नालंदा विक्रमशिला तक्सीला जैसे विश्व्व विद्यालय हमने दिए। पूरा संसार हमारे यहाँ पढ़ने
आता था। हमारे लिए पूरा संसार ही हमारा घर था। हमारी संस्कृति सबसे सम्पन है जिसमे लोग आज भी अपने माता पिता को अपना भगवान मानते है। औरतो को हम देवी शक्ति का रूप मानते है लेकिन पश्चिमी सभयता के प्रवेश के कारन आज हमारे समाज का विकृत रूप देखने को मिलता है। हम अपने बड़े की इज्जत नहीं करते ,गुरु का सम्मान करते ,औरतो की इज्जत नहीं करते और परिणामस्वरूप बलात्कार चोरी हत्या
जैसे अपराध समाज मे बढ़ रहे है। हमारा युवा भटक रहा है लिए हमे फिर से पीछे चलना होगा। वेदो की और लोटो। हमे दुनिया के पीछे नहीं अपने वेदो के ज्ञान की तरफ बजाना चाहिए क्युकी हमारे पूरवज बड़े ग्यानी थें। हमारा भटकाव हमारे गरावसाली संस्कृति को धूमिल कर रहा हैं। आज आजादी के नाम पैर जिस तरह की अराजकता हैं समाज में की अमीर और अमीर होता जा रहा हैं और गरीब और गरीब। हमारे लोकनृत्य ,संगीत कला सब कुछ अपनी अंतिम साँसे गिण रहा हैं। अंग्रेजो ने हमारे संस्कृतो को बर्बाद किया तो समझ हैं वो हमारे कला को श्रेष्ठ नहीं मानते थें लेकिन अब तो देश आजाद हैं और हमपर हमारा ही सासन हैं तो फिर क्यों हमारे कलाकार मर रहे हैं। उनके सरंक्षण के नाम पर दिखावा होता हैं कभी शिल्प मेला के नाम पर तो कभी किसी दिवस के नाम पर। हमारी सरकार को अपनी संस्कृति का अपमान बंद करना चाहिए अगर वो कुछ कर नहीं सकते तो अपमान तो न करे।
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