Tuesday, 23 December 2014

देश का दुर्भाग्य

हमारे देश का बड़ा दुर्भाग्य हैं की हमें अपने इतिहास को जानने के लिए हमें विदेशो के तरफ देखना पड़ता हैं। हम इतने आलसी है की हमे सब कुछ बना बनाया ही चाहिए। कई बार तो ये विदेशी हमारे इतिहास को तोड़ मरोड़कर पेश करते हैं क्योकि उनका उद्देश्य फूट डालो और  शासन  करो रहता हैं। हमारे यहाँ का विज्ञान और चिकित्सा  यूरोप से  बहुत आगे था। विज्ञान जिस तथ्य को 2014 में समझ पाते हैं वो हमारे यहाँ के ग्रंथो में  आदि काल में ही उसका जिक्र मिलता हैं। हमारे राजनेता कभी भी  उन तथ्यों को संसार के सामने नहीं लाते  हैं। हमारा दर्शन, साहित्य, विज्ञान , चिकित्सा, योग, कला उच्च कोटि के थें  पर हमारे सरकार की उदासीनता के कारन इसका श्रेय अरस्तू प्लेटो जैसे दार्शिनीको को मिल जा रहा हैं जबकि अरस्तू के शिस्य सिकंदर ने खुद माना  था की भारत हर क्षेत्र में आगे हैं।
                                           नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ मैं योग को सम्मान दिलाकर हम भारतीयों को गर्व करने का एक मौका दिया हैं लेकिन अभी बहुत कुछ है जो भारत ने किया हैं जिसका सम्मान  दूसरे राष्ट्र ले रहे हैं जो उन विद्वानो का अपमान हैं जिन्होंने उन सिद्धांतो को प्रतिपादित किया था.लेकिन हमारे देश वालो का दिल बहुत बड़ा  हैं उन्हें इनसे कोई मतलब नहीं है लेकिन भावी पीढ़ी तो  शायद इन्हे भूल ही  क्योकि हमारे  इतिहासकारो ने इन्हे इतिहास में जगह नहीं  सके  राजनेताओ ने उन्हें सम्मान नहीं दिलवा सके। मोदी से आशाये बहुत हैं जिसके तरफ उन्होंने मजबूती से  कदम भी उठाया हैं जिसका परिणाम हैं की भारतीय योग को संसार ने सम्मान दिया हैं और योग दिवस मनाने का फैसला किया  हैं।  कार्ल मार्क्स और मैक्स वेबर जैसे पाश्चात्य संस्कृति के लोग, जो कभी भारत नही आये और न ही उन्होंने भारत का साहित्य पढ़ा, लेकिन आज भारत के शीर्ष शैक्षणिक, सामाजिक और सरकारी संस्थान आजादी के 67 वर्षों बाद भी इनके विचारों से संचालित हो रहे हैं.क्या  हमारे देश की गौरवशाली शिक्षण पद्धति  कमतर हैं जिसने  समूचे संसार को ज्ञान देने की परम्परा की शुरआत की थी।हमें फोबिया रोग है की पाश्चात्य शिक्षण हमें बेहतर इंसान बनता हैं पर वास्तव में हम मात्र नक़ल कर रहे हैं जो किसी भी रूप में उचित नहीं हैं। 

लोकतंत्र की जीत

 |आज भारतीय जनता पार्टी की जीत ने स्पस्ट कर दिया हैं की अब जनता वंसवाद की राजनीति से ऊब चुकी हैं। अब लोगो को जात  पात और धर्म  के नाम पर मुर्ख बनाकर वोट मांगना अन्य दलो के लिए मुस्किल हो रहा हैं। शिक्षा की जागरूकता ने और संचार के विकास ने पार्टी की  कथनी और करनी में  अंतर स्पस्ट कर दिया हैं। लोकतंत्र में संचार की महती भूमिका होती है इसलिए तो संचार को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहते हैं। लोकतंत्र की रक्षा के लिए संचार और न्यायपालिका की बड़ी भूमिका होती हैं। कांग्रेस,सपा ,राजद ,रालोद  जैसी पार्टी जो परिवार की पार्टी है जो एक जाती विषेस की राजनीती करती है उन्हें ये समझ जाना चाहिए की अब जनता विकास चाहती हैं और जो विकास करेगा वो सत्ता में रहेगा और जो इसके इतर काम करेगा उसकी राजनीति ख़त्म समझो। जनता लोगो को चुन केर भेजती है की सरकार हमारा विकास करेगी पर  ये लोग अपनी ही जेब  भरने लगते हैं। अब जनता जाग गयी है और राजनितिक  दलों को अपनी पालिसी बदलनी होगी नहीं तो वो दिन भी दूर नहीं की ये पार्टिया भी भारतीय राजनीती का इतिहास बन जाएँगी।  जब सत्ता में बैठे लोग अपना नैतिक व सैवेधानिंक दायित्व नही निभाते है तो आमजन अपना नैसर्गिक व मौलिक अधिकार पाने के लिय महाक्रान्ति के लिय तैयार हो उठता है|इसकी शुरुआत जनता ने अपने सबसे बड़े अधिकार मतदान का खूब प्रयोग किया हैं। जिसका परिणाम यह हुआ की झारखण्ड,महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावो में देखने को मिला हैं और उम्मीद करते हैं ये सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।
                लोकतंत्र में परिवतन बहुत जरुरी होता है नहीं तो सत्ताधीन सरकार को निरंकुश होते समय नहीं लगता। कांग्रेस भी सायद इसी पूर्वाग्रह से ग्रसित थी की विगत 60 साल से सत्ता पर काबिज हूँ और कोई विकल्प नहीं हैं जनता के पास। अब सभी पार्टियो को वंसवाद और जाट पात की राजनीती से ऊपर उठकर राजनीति करनी होगी नहीं तो उनकी राजनीति खत्म हो जाएगी। 

Saturday, 20 December 2014

पाकिस्तान और आतंकवाद

आज सभी देश आतंकवाद की समस्या से परेसान हैं। पेशावर की घटना ने तो सभी देशो को स्तभत कर दिया हैं। सभी राष्ट्र इसको खत्म करना चाहते हैं लेकिन अपनी तुस्टीकरण की नीति के कारन इसके निवारण के लिए कुछ नहीं करना चाहते। पाकिस्तान ने पेशावर की घटना के बाद आतंकवाद के खात्मे के लिए कटिबद्धता जाहिर की लेकिन अगले दिन हाफिज सईद के बयान और 26/11 के सबसे बड़े दोषी को छोड़कर अपने दोहरे चरित्र को पुरे देशो को दिखाया हैं। भारत से न जाने कौन सी दुश्मनी हैं पाकिस्तान को की उन्हें १३२ मासूम बच्चो की चीखे भी नहीं सुनाई देती है। मानवता को सर्मसार करने वाली घटना के बाद भी पाक सरकार नहीं जांघ रही है तो उससे आतंकवाद के खात्मे की अपेक्षा करना ही मूर्खता है। आतंकवाद को कोई धर्म से जोड़ना गलत होगा क्योकि वो मानवता के दुश्मन है जिनका कोई धर्म नही हैं क्योकि बच्चो की हत्या करने वाला इंसान तो नहीं हो सकता और जानवरो का कोई धर्म नहीं होता हैं।
                                                                      मैं अपने देश के सभी नागरिको से अपील करना चाहता हूँ की ये देश हम सभी का हैं और इसकी रक्षा  हमे करनी होगी और इसके लिए बन्दुक उठाने की जरूरत नहीं हैं बस देश को तोड़ने वालो की बातो मैं नहीं आना हैं।हमारे एकता और आपस का विस्वास ही हमारी सबसे बड़ी ताकत हैं और इसी के कारन हमने 1965 ,71, 99 ,48 की लड़ाई जीती थी और इसी से घबराया पाकिस्तान अब सीधी लड़ाई नहीं बल्कि हमें तोड़कर आतंकवाद के माध्यम से हमे हराना कहता हैं। अब हमें और सतर्क रहना हैं क्युकी हमारा दुश्मन अब आगें  से नहीं पीछे से वार करने वाला हैं। आतंकवाद और पाकिस्तान एक दूसरे के पूरक हैं जैसे हम संसार को कोयला लोहा निर्यात करते हैं और वो संसार को आतंकवाद दे रहे हैं.। 

पश्चिमी सभयता के प्रभाव


आज आधुनिक दौर मैं हम कही न कही अपने परिवार से दूर होते जा रहे हैं.पश्चिमी सभयता के प्रभाव के कारन हम सयुक्त परिवार से दूर भाग रहे है। कहते है की माँ बाप चार बच्चो को पाल सकते है लेकिन बच्चे
अपने एक माँ बाप को नहीं पाल सकते है। हम अपने संस्कृति से दूर भाग रहे है कुकी भारत ही वो एक मात्र ऐसा देश है जो सामूहिक परिवार मैं रहने की बात करता हैं। माँ बाप जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी और पूरी बचत बच्चो के भविस्य को बनाने मैं ख़र्च कर  दियाऔर हम उन्हें दो वक्त की रोटी और थोड़ा सा अपना प्यार
नहीं दे पा रहे है। माँ के  प्यार पर कब पत्नी का प्यार भरी पड़ने लगता हैं पता नहीं चलता है। माँ बाप पृथ्वी पैर ईश्वर का दूसरा रूप होता हैं और उनकी सेवा ही भगवान की सेवा हैं। हमे किसी तीर्थ स्थल पैर जाने की जरुरत नहीं हैं.। भारत जैसे देश में ओल्ड सेंटर का होना ही दुर्भाग्य की बात है। वृन्दावन मैं बुजुर्ग महिला की संख्या
देखकर मेरा सीना फट जाता हैं।
                                              मैं आज के युवाओ से अपील करना चाहता हूँ की वो अपने माता पिता की इज्जत करे उनका सामान करे। भगवान कही नहीं मिलेंगे सिर्फ उनके दिल से निकला आशीर्वाद ही हमारी सफलता की कुंजी होगी। वास्तव में जब किसी पेड़ की मजबूती उसके जड़ो की मजबूती से आकि जाती हैं वैसे ही दूसरे देश मैं हमें सम्मान तभी मिलेगा जब हम अपनी सभ्यता का सम्मान करेंगे। विवेकानंद ,अटल बिहारी वाजपेई ,नरेंद्र मोदी को सम्मान तब मिला जब उन्होंने अपने संस्कृति का सम्मान करते हुए अमेरिका में हिंदी में बात की थी। जब हम सभी पश्चिमी हवा में बहेंगे तो भीड़ में खो जायेंगे न हमें घर मैं सम्मान मिलेगा न पश्चिमी देशो में।हमारा समाज जोड़ने में विश्वास करता हैं और पश्चिमी सभ्यता तोड़ने में जिसका परिणाम है की भारत में एकल परिवारो की संख्या बढ़ रही हैं। 

Sunday, 14 December 2014

संस्कृति का अपमान

हमारे देश को नक़ल करने की आदत है हम हर  अच्छी दिखने वाली चीजो को अपने मे  उतार लेते है परिणामस्वरूप हम अपनी गौरव साली पुरातन संस्कृति को भूल जाते है.। हमारे देश ने पहली नगरीय सभयता को जनम दिया जिसे पूरा संसार सिंधु घाटी की सभयता के नाम से जानती है। हमने संसार को
पढ़ना सिखाया ,नालंदा विक्रमशिला तक्सीला जैसे विश्व्व विद्यालय हमने दिए। पूरा संसार हमारे यहाँ पढ़ने
आता था। हमारे लिए पूरा संसार ही हमारा घर था। हमारी संस्कृति सबसे सम्पन है जिसमे लोग आज भी अपने माता पिता को अपना भगवान मानते है। औरतो को हम देवी शक्ति का रूप मानते है लेकिन पश्चिमी सभयता के प्रवेश के कारन आज हमारे समाज का विकृत रूप देखने को मिलता है। हम अपने बड़े  की इज्जत नहीं करते ,गुरु का सम्मान करते ,औरतो की इज्जत नहीं करते और परिणामस्वरूप बलात्कार चोरी हत्या
जैसे अपराध समाज मे  बढ़ रहे है। हमारा युवा भटक रहा है  लिए हमे फिर से पीछे चलना होगा। वेदो की और लोटो। हमे दुनिया के पीछे नहीं अपने वेदो के ज्ञान की तरफ बजाना चाहिए क्युकी हमारे पूरवज बड़े ग्यानी थें।  हमारा भटकाव हमारे गरावसाली संस्कृति को धूमिल कर रहा हैं। आज आजादी के नाम पैर जिस तरह की अराजकता हैं समाज में की अमीर और अमीर होता जा रहा हैं और गरीब और गरीब। हमारे लोकनृत्य ,संगीत कला सब कुछ अपनी अंतिम साँसे गिण रहा हैं। अंग्रेजो ने हमारे संस्कृतो को बर्बाद किया तो समझ हैं वो हमारे कला को श्रेष्ठ नहीं मानते थें लेकिन अब तो देश आजाद हैं और हमपर हमारा ही सासन हैं तो फिर क्यों  हमारे कलाकार मर रहे हैं। उनके सरंक्षण के नाम पर दिखावा होता हैं कभी शिल्प मेला के नाम पर तो कभी किसी दिवस के नाम पर। हमारी सरकार को अपनी संस्कृति का अपमान बंद करना चाहिए अगर वो कुछ कर नहीं सकते तो अपमान तो न करे। 

धर्मांतरण का मुद्दा

इस समय हमारे देश की राजनीति में  आगरा का धर्मपरिवर्तन का मुद्दा छाया है। जिसे देखो इसकी ही चर्चा कर रहा है। में मानता  हु की मानवता ही सबसे बड़ा धर्म  है और इंसानो की सेवा करना सबसे बड़ी पूजा है।सभी धर्म ने यह माना है की ईश्वर एक है चाहे वह इस्लाम हो ईसाई  हो या सिख हो या पारसी हो और सनातन धरम तो पुरे संसार को एक ही ईश्वर  की संतान मानती है। ये सब कुछ राजनीति है जिसे हम सबको समझना है।मानता हूँ  किसी व्यक्ति के लिए धर्म उतना ही जरुरी है जितना जीने के लिए धुप,क्योकि धर्म  उस पेड़ की तरह है जो हमे छाव देता है उसी तरह धर्म  की छाँव में इंसान अपने भगवान तक पहुचने की कोशिश  करता है.                                                                                                                                                                  मैं सिर्फ इतनी अपील करूँगा की इस मुद्दे पर  हम सब हाय तोबा मचा कर अपने देश के दुश्मनो को और मजबूत कर रहे है चाहे वो पाकिस्तान हो या चीन हो ,वो हमे विकास करते नहीं देख सकते। हमारे देश के मुसलमान भी उतना ही प्यार इस मुल्क से करता है जितना हम। हम अब्दुल  हामिद की सहादत  और कलाम को कैसे भूल सकते है. जिन्ना और दाऊद के कारण इनका देश प्रेम छोटा नहीं  हो जाता।किसी की मज़बूरी का लाभ उठाकर किसी का धर्मपरिवर्तन करना सबसे बड़ा पाप हैं। धर्म परिवर्तन का जो खेल औरंगजेब ने शुरू किया आजादी के बाद ईसाई लोगो ने चैरिटी के नाम पर धरम परिवर्तन सुरु किया वो बहुत गलत हैं। धरम एक संस्कार होता हैं जो दबाव  में और गुमराह करके परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। आप अपने धरम का प्रचार करे उनके सिधान्तो को फैलाइये इसकी आजादी हमे संविधान भी देता हैं लेकिन किसी गरीब और शोषित  समाज को उसके धरम के प्रति भड़का कर धरम परिवर्तन करना गलत हैं और मैं तो हिन्दू मुसलमान और ईसाई सभी को धरम परिवर्तन करने व करवाने की निंदा करता हूँ। सरकार को इस सन्दर्भ में कठोर नियम बनाने चाहिए और राजनीती से ऊपर इस समस्या का निवारण करना चाहिए। हमारे देश की अस्मिता अनेकता में एकता की हैं जिसे धूमिल  नहीं होने देना हैं। 

Tuesday, 9 December 2014

दोस्ती

दोस्ती एक ऐसा रिस्ता है जो इंसान खुद चुनता है नहीं तो और रिश्ते तो गॉड गिफ्टेड होता है चाहे वो माँ बाप भाई बहन यहाँ तक की पति पत्नी तक का रिस्ता भी हम नहीं चुनते है लेकिन दोस्ती का रिस्ता इंसान खुद चुनता है इसलिए इसमें इंसान को ईमानदार रहना चाहिए। दोस्ती है क्या  जो दूर रहकर पास हो,जो औरो से ख़ास हो , जिसका अंदाज सबसे निराला हो ,अपने तकदीर पर  जिसे विस्वास हो। हमे अपने दोस्तों के साथ धोखा नहीं करना चाहिए क्योकि इससे मानवता पर से विस्वास उठ जायेगा।हमारा इतिहास ऐसे कई दोस्ती के किस्से  से भरे पड़े हैं। दोस्ती  इंसानो का इंसानो से ही नहीं  जाती। इंसानो ने जानवरो से भी दोस्ती की थी  जानवरो ने अपनी जान देकर अपने दोस्त  बचाई थी। महाराणा प्रताप और  दोस्ती पुरे भारत में प्रसिद्ध हैं। जीवन में अच्छे दोस्त मिलना उतना ही मुस्किल हैं जितना  भगवान को खोजना । आज समाज में अवसरवादी मित्र ही मिलते हैं जो अच्छे समय में तो हमसफ़र की तरह मिलते हैं लेकिन जब समय विपरीत रहता हैं तो वो गधे के सींग जैसे गायब हो जाते हैं। सच्चे मित्र की पहचान विपत्ति ही होती हैं। उस समय जो मित्र परछाई के  साथ दे वो ही सच्चा मित्र होता हैं सुख मैं तो सारी  दुनिया ही मित्र जैसा व्यवहार करते हैं। जो आपसे दोस्ती बिना किसी स्वार्थ और लोलुपता के करे और दोस्ती पूरी ईमानदारी से निभाए वो सच्चे दोस्त होते हैं। दोस्ती में हम जितने ईमानदारी की अपेक्षा करते हैं उतनी ही ईमानदारी हमें भी अपने दोस्त के प्रति करनी चाहिए क्युकी जैसे हम अपने दोस्तों को सक की निगाहो से देखते हैं वैसे ही वो भी हमें सक की निगाहो से देख सकते हैं। जिस प्रकार दोस्ती हम चुनते हैं तो इसकी जिम्मेदारी भी हमारी ही होती हैं। कलयुग में दोस्त मिलना ही किसी वरदान से कम नहीं हैं । हमारे भारतवर्ष में तो कई दोस्ती के किस्से प्रसिद्ध हैं जिसे देखते हुए बॉलीवुड में कई फिल्मे दोस्ती पर बनी हैं । 

Wednesday, 3 December 2014

परिवर्तन

भारतीय अर्थव्यवस्था हाथी की तरह बड़ी और विशाल है।लेकिन इसको शेर की तरह गतिशील और स्फूर्तिवान करने की जिम्मेदारी सरकार की है।कुछ सरकारी नीतियों में बदलाव की आवश्यकता है। हमारा देश इस वक़्त गरीबी की चुनौती से लड़ने की ताकत बटोरने के अथक प्रयास में लगा हुआ है। इन प्रयासो को एक दिशा आर्थिक नीतियों में सुधार के  माध्यम से ही दी जा सकती है । समय के साथ चुनौतियां भी बदलती है इसलिए कानून बदलने चाहिए । जैसे हम सुविधा अनुसार गर्मी मे हलके  कपडे और ठंडी मे गरम कपडे पहनते है वैसे ही कानून भी समय की मांग के अनुसार बदलना चाहिए,शायद  इसी कारण नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालते ही कठोर निर्णय लेने का फैसला लिया था.।लाल किले के पहले भाषण में ही मोदी ने योजना आयोग की समापत्ति की घोषणा  कर दी और नीति आयोग की पहल की जिसमे उन्होंने सभी राज्यों के मुख्यामंत्री को शामिल करने की बात की हैं क्योकि उनका मानना हैं की जब योजना राज्यों के लिए बनाई जा रही हैं तो उनकी भागीदारी तो बहुत जरूरी  हैं। मोदी सबका साथ सबका विकास के फॉर्मूले को निभाते हुए उन्होंने नीति आयोग का गठन किया हैं। इसकी सफलता और विफलता तो भविष्य  के गोद में हैं लेकिन फिलहाल गरीबो का दर्द कम  होना बाकी है। नरेंद्र मोदी को इन्ही गरीबो के वोट से ही पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का गौरव प्राप्त हुआ है और उनकी पहली प्राथमिकता इनके दुखो को दूर करना होगा। परिवर्तन की शुरुवात तो नरेंद्र मोदी ने की हैं पर  जमींन  पर उसका फल अभी नहीं मिल रहा है।नरेंद्र मोदी ने खुद को शासक नहीं बल्कि सेवक के रूप पेश किया हैं जिससे जनता उनसे ज्यादा की उम्मीद करता हैं। मोदी जल्दबादी में विदेशी कम्पनियो को भारत मैं बढ़ावा दे रहे जिससे देश में थोड़ी असुरक्षा की भावना भी  रही हैं।
        न्यायालय के जजो की नियुक्ति के पैनल में भी सुधर किया गया हैं क्योकि पुराने पद्धति में सिफारिशें और चाटुकारिता का एक सिलसिला सा सुरु हो गया था जो किसी रूप मैं सही नहीं माना  जा सकता।  कानून पर आस्था सिर्फ न्यायालय की वजह से जिन्दा हैं जिसमे अब राजनीती का तड़का लग चुका था जो शायद इस परिवर्तन से सुधर  सके नहीं तो शायद  लोगो का लोकतंत्र पर से विशवास उठ जायेगा। 

उम्मीद का दूसरा नाम अराध्य संस्थान

                 
                 समाज के पिछड़े वर्ग की दशा और दिशा को सुधारने के लिए कई स्तर पर कई प्रयास किए गए हैं, लेकिन उसमें सफलता प्राप्त कर दूसरों के सामने उदाहरण पेश करना कम लोगों के खाते में आया होगा। उनमें से एक हैं समाजसेवक और आराध्य संस्था के संस्थापक उमेश राय।
            उन्होंने अपने प्रयासों से न सिर्फ पिछड़ी और जरूरतमंद महिलाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए, बल्कि सैकड़ों को इसका लाभ भी मिला। भलस्वा क्षेत्र में रहकर 16 वर्षों से विभिन्न गैरसरकारी संस्थाओं और संगठनों के साथ मिलकर कार्य कर रहे उमेश राय ने विभिन्न प्रकार के माध्यमों से जरूरतमंद लोगों की मदद की है और उन्हें रोजगार मुहैया कराने का कार्य किया है। वे दूसरों को लिए प्रेरणा श्रोत हैं।
        संस्था के माध्यम से सामूहिक रूप से बेघर लोगों की मदद के लिए भी कार्य किए जा रहे हैं। इसके तहत नाइट शेल्टर की व्यवस्था और गर्म कपड़े, कंबल और अन्य जन सुविधाओं की व्यवस्था की जाती है। इसके अलावा संस्था के स्त्री सुविधा केंद्र में महिलाओं के लिए विशेष व्यावसायिक प्रशिक्षण व शिक्षा केंद्र में कार्य होते हैं जहां महिलाएं रोजगार प्रशिक्षण के साथ ही शिक्षा भी प्राप्त करती हैं। महिला पंचायत के माध्यम से समय-समय पर विभिन्न कालोनियों और ग्रामीण क्षेत्रों में अभावग्रस्त महिलाओं को उनके अधिकार और नए अवसरों के बारे में जानकारी दी जाती है। उमेश राय ने सैकड़ों महिलाओं को प्रशिक्षण के माध्यम से रोजगार के अवसर तलाशने में मदद कर रहे हैं। जहां उन्हें  कम्प्यूटर  शिक्षा की आधुनिक शिक्षा के साथ साथ घरेलू स्तर पर उद्योगों की शुरुआत करने के लिए जरूरी जानकारी देने का कार्य करते हैं। इसके अलावा सौंदर्य प्रशिक्षण, सिलाई, कढ़ाई व आर्ट क्राफ्ट की ट्रेनिंग दी जाती है।
          इससे उन्हें रोजगार शुरू करने का बेहतर मौका मिलता है। हर क्षेत्र में अब तक सैकड़ों लोगों को इसका लाभ मिला है। संस्था की मदद से सिलाई में जहां अबतक 509 जरूरतमंद महिलाओं ने रोजगार प्राप्त किया है वहीं कम्प्यूटर का प्रशिक्षण लेने वाले करीब 530 लोगों को रोजगार मिला।ऐसे ही छोटे छोटे कदम एक दिन बहुत बड़ी उपलब्धि बनती हैं। कैलाश सत्यार्थी को ही ले लीजिये बचपन बचाओ आंदोलन ने आज उन्हें नोबेल विजेता बना दिया। निश्चित रूप से उमेश राय के ये कार्य मानवता के लिए और समाज के ठेकेदारो के लिए अच्छा उदहारण हैं। आज समाज को उमेश राय जैसे लोगो की जरुरत हैं जो सिर्फ अपने बारे मैं न सोचकर पुरे समाज के बारे मैं सोचते हैं।