आजादी के 68 साल बाद भी हमारा
समाज दो वर्गो में बंटा हैं जिनमे एक के पास सारी सुविधाये उपलब्ध है तो वही एक
जीने के लिए रोज जद्दोजहद कर रहा हैं. अथक परिश्रम के बाद वो दो वक्त की रोटी नहीं
जुटा पा रहा हैं. उनका परिवार शिक्षा स्वास्थ्य और सुविधाओ से महरूम है, जिन्हें समाज मजदूर कहता है. इन मजदूरो का कोई इतिहास नहीं है लेकिन हर
इतिहास इनके बिना अधूरा हैं. मजदूर का पर्याय उनसे हैं जो मजे से दूर हो जिन्होंने
जीवन में कोई सुख न देखा हो, वो गुमनामी में पैदा होता है और
गुमनामी में ही मर जाता हैं.
मजदूरो के हितो रक्षा के लिए राष्ट्रीय, अन्तराष्ट्रीय स्तर पर कई संघटन काम कर रहे है लेकिन आज भी उनके जीवन स्तर
में कोई सुधार नहीं हो सका है.आज भी उनका शोषण हो रहा है बस उसका तरीका बादल दिया
गया हैं. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले के प्राचीर से अपने पहले अभिभाषण
में “श्रमेव जयते” कहकर जरुर एक आस
जगाई थी लेकिन अभी हाल में हुए 46वे श्रमिक संघ की बैठक में
वो आस भी धराशायी हो गयी. मोदी ने भी अपने पूर्ववर्ती शासको की तरह एक समिति का
गठन कर डाला जो मजदूरो की वास्तविक स्तिथि, जीवन शैली का अध्ययन
करेगी.
मोदी खुद एक मजदूर और चाय बेचने वाले परिवार से निकलकर देश की राजनीति
में शिखर पर आये हैं ऐसे में उन्हें खुद ज्ञात हैं की एक मजदूर किस तरह हर रात
अपना पेट दबाकर सोता हैं. पिछले 68 साल से सिर्फ
समितिया बन रही है जो एसी कमरों में बनती है और फिर ठन्डे बस्ते में चली जाती
है.समय समय पर देश में कुछ ऐसे जननेता हुए जिन्होंने इन मजदूरो की कराह को देश की आवाज
बना कर सत्ता के गलियारों तक ले गए जिनमे एम.एन.राय, राम
मनोहर लोहिया,जय प्रकाश नारायण का नाम अमर रहेगा.सरकार जिस
विकास का दावा करती है वो कही न कही किसी मजदूर की श्रम की कहानी होती है जो विकास
की इमारत में मजदूर का खून पसीना बनकर बह रही है,फिर भी
मजदूर गरीबी व बदहाली का बोझ ढो रही है. विकास में अमीर जमीं से आसमान पर चढ़ता है
लेकिन मजदूर हमेशा अपने रोटी की लड़ाई पुराने ढंग से लड़ता है. वास्तव में मजदूर के
कंधो पर विश्व की उन्नति का दारोमदार होता है, लेकिन विश्व
का ऐसा कोई देश नहीं जहां मजदूरो का शोषण नही होता हैं. इन्हें अपनी मर्जी से न
जीवन जीने का हक़ होता है और न सोचने का. समय समय पर मजदूरो की स्तिथि में आंशिक
सुधर हुआ और उनका पारिश्रमिक तय किया जाने लगा, साथ ही उनके
हितो की रक्षा के लिए मजदूर संघटनो का गठन होने लगा.
तकनीक के विकास ने मजदूरो की स्तिथि और ख़राब कर दी क्योंकी जिस
काम के लिए 100 मजदूर लगते थे उसे मशीन चंद
घंटो में पूरा कर देती है जिससे श्रमिको का मूल्य घटे लगा बेरोजगारी में बेतहाशा
वृद्धि हुई जिसका परिणाम है की मजदूर को बेगारी करना पड़ रहा है. कारखानो में काम
करते हुए मजदूर का शारीरिक नुकसान होने पर पर भी कंपनी मालिक कोई ख़ास भरपाई नहीं
करते हैं. न्यायालयों का दरवाजा खटखटाने पर सिर्फ तारीख पर तारीख मिलती हैं.मजदूर
न्याय की आस में अपनी जान दे देते हैं.
14 अगस्त 1987 के बालश्रम नीति के अनुसार मजदूरी करते बच्चो के पुनर्वास की व्यवस्था की गयी है इसे उन राज्यों में लागू किया गया जहा बाल मजदूरी की ज्यादा शिकायते थी.इस कानून को कठोरता से लागु करने का प्रावधान था जिससे बाल मजदूरी को 10वी पंचवर्षीय योजना तक खत्म किया जा सके. फैक्ट्री कानून 1948 के अनुसार 14 से कम उम्र के बच्चो का काम करना निषिद्ध है साथ ही 15 साल से उपर के बच्चो को मेडिकल जांच के बाद ही काम पर रखा जा सकता है. वे सिर्फ 4 से 5 घंटे ही काम कर सकते है साथ ही उन्हें रात में काम करना निषेध है. इसी कानून के खंड 22(2) के अनुसार किसी महिला श्रमिक को प्राइम मूवर (मूल गति उत्पादक) या किसी भी मशीनरी के किसी भाग की सफाई लुब्रिकेट को समायोजित करने का अधिकार नहीं होगा यदि कम्पनी मालिक ऐसा करने को महिला को बाध्य करता है तो दंड का भागीदार होगा. फैक्ट्री एक्ट 1984 (कारखाना अधिनियम) के सेक्शन 27 के अनुसार कॉटन प्रेसिंग जिसमे कॉटन ओपनर काम करता है ऐसे कारखाने के किसी भाग में महिला श्रम पूर्णतः प्रतिबंधित है साथ ही सेक्शन 66(1)(बी) के अनुसार किसी कारखाने में महिला श्रमिक सुबह 6 से शाम 7 बजे के बीच ही काम करने की अनुमति है.

समाज में ये अंतर सदियों से रहा है, फर्क हमारी सोच में है जिसमे इतने ज्यादा वर्ग है कि संघर्ष तो होगा ही लेकिन ये हमारे ही समाज के खोखले नियम है जो जल्दी बदलते नही|
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