मार्च की समाप्ति के साथ ही सूर्य देव ने अपनी
भृकुटी भी टेढ़ी कर ली हैं | इसी का परिणाम हैं कि अप्रैल के पहले ही सप्ताह
में ही पारा 40 के पार चला गया हैं | लोग परेशान व हैरान हैं कि इतनी जल्दी इतनी
गर्मी और उमस कैसे ? जबकि इसका सीधा उत्तर हम सभी जानते हैं कि हमने जो बोया हैं
बस वही काट रहे हैं | जी हाँ हमने जिस तरह से प्रकृति का दोहन किया,
मनमाने तरीके से जंगलो को काटा, नदियों पर बांध बना डाले गये और लगातार प्राकृतिक
संसाधनों का दोहन | ऐसे में प्रकृति विभिन्न आपदाओ के रूप में अपनी
उपस्थिति दर्ज कराती रहती हैं फिर हम ईश्वर को कठोर होने का आरोप लगाते हैं, जबकि
हम कितने संवेदनहीन हो गए हैं उसपर कोई चर्चा नहीं |
गर्मी आते ही लोग अपने कूलर, एसी, फ्रीज को दुरुस्त करने में लग गए हैं | लेकिन उन जानवरों
का क्या जो इस गर्मी को झेलने के लिए सडको पर होंगे | वो लाखो लोग कहा
जायेंगे जिनकी छत्त ये खुला आसमान और घर जमीन होगी | लोग गर्मियों से
बचने के लिए खूब रस पी रहे हैं फिर चाहे
वो बेल का हो या आम का | हम जिस तरह से प्रकृति से खेल रहे हैं उसका ठीक
दुगना भूकंप, बाढ़, सुनामी के रूप में हमारे सामने आ रही हैं | समय से पहले गर्मी,
अनियमित वर्षा और ठंडी न पड़ने से खेती बर्बाद हो रही हैं जिसका परिणाम निकट समय
में खाद्यान संकट के रूप में हमारे सामने होगा | आज पूरा विश्व इस
समस्या को लेकर गंभीर हैं | ओजोन परत में छेद बड़ा होने लगा हैं जिससे
ग्लेशियर पिघलने का डर बना हुआ हैं, लेकिन इस विकट समय में भी सभी देश एक दूसरे का
मुह देख रहे हैं | अभी किसानो कि गेहूँ कि फसल भी खेतो में खड़ी हैं,
जिसकी पूरी कटाई-मड़ाई अभी बाकी हैं | जबकि लोगो में भी कई नयी बीमारियों ने हमला
बोलना शुरू कर दिया है, जिसमे सन बर्न, ब्रेन स्ट्रोक, बुखार प्रमुख हैं | इस गर्मी में जब
जानवरों और सडको पर रहने वालो के बारे में सोचता हूँ तो सीहर उठता हूँ | हम जबकि सभी
संसाधनों से लैस हैं तो हमारा ये हाल हैं कि हमारा आधा समय पसीने पोछने में ही चला
जाता हैं, जबकि उनका क्या होता होगा जो सूर्य देव के गुस्से के सीधे शिकार हो रहे
हैं |
हे देव,
उन्हें शक्ति प्रदान करना |
अभिजीत कुमार सिंह
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग
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