आज भी जब मुझसे पत्रकारिता करने का कारण पूछा जाता
हैं तो मैं असमंजस में पड जाता हूँ | इसका कारण ये कतई नहीं हैं कि मैं अनिक्षा से
पत्रकारिता कर रहा हूँ , लेकिन मेरे पत्रकारिता करने का उद्देश्य लोगो को
हास्यास्पद लगता हैं |
उनका मानना हैं कि ये आदर्शवादी सोच इंसान के पेट के आग के आगे यूँ काफूर हो जाता
है, जैसे
गधे के सर से सींग |
आज पत्रकारिता जिस तरह से मिशन से बाजारवाद कि तरफ बढ़ रहा हैं वो कही न कही लोकतंत्र
के लिए ख़तरा बनकर सामने आयेगा | लोकतंत्र में मीडिया कि भूमिका क्या हैं इसका आकलन
लोकतंत्र में इसके चोथे स्तम्भ से लगाया जा सकता हैं | हमारे देश में पत्रकारिता
का एक गौरवशाली इतिहास रहा हैं जो आज भी हमें गौरवान्वित करता हैं जिसमे राजा राममोहन
राय, जुगल
किशोर, ईश्वरचंद
विद्यासागर, गांधीजी, नेहरु, तिलक,
धर्मवीर भारती, प्रेमचंद जैसे सरीखे संपादको का नाम भारतीय
पत्रकारिता में बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता हैं | भारत की आजादी में पत्रकारिता की
भूमिका को कोई भी प्रबुद्ध समाज दरकिनार नहीं कर सकता हैं |
लेकिन
आज कि सबसे बड़ी विडम्बना ही कहेंगे कि जिस पत्रकारों को लोगो तक उनके अधिकारों कि
सुलभता सुनिश्चित करने का जिम्मा होता हैं साथ ही लोगो का शोषण न हो
इसके लिए सदेव तैयार रहने वाले पत्रकारों के साथ ही सबसे बड़ा शोषण होता हैं | कहने को तो पत्रकारों के हितो के रक्षा के लिए प्रेस
कौंसिल हैं, साथ ही समय समय पर अनेक आयोग भी बनाये जाते हैं जो
पत्रकारों के हितो के रक्षा के लिए काम करती हैं | लेकिन इनकी सिफारिशों के बाद भी पत्रकारों का जीवन
उनके वेतन के जैसे ही संघर्षशील बना हुआ हैं |
मजीठिया आयोग ने पत्रकारों के जीवन को एक सम्मान जनक स्तर पर लाने के लिए कई सिफारिशे की जिसका प्रभाव जमीनी स्तर पर नहीं देखने को मिला हैं | फलस्वरूप वो धन अर्जन के दूसरे विकल्प कि तलाश करते हैं जिसे लोग दलाली कहते हैं साथ ही पत्रकारिता के विश्वसनीयता को भी संदेहास्पद नजरों से देखा जाता हैं | पत्रकार का जीवन कितना संघर्षपूर्ण होता हैं इसकी कल्पना कोई साधारण इन्सान नहीं कर सकता हैं | 24×7 कि ड्यूटी और इसके साथ ये भी हैं कि पत्रकार कभी छुट्टी पर नहीं होता हैं उसे जहा कोई अप्रिय घटना दिखती हैं उसे तत्काल रिपोर्टिंग करनी हैं फिर चाहें वो काम पर हो या छुट्टी पर | सामाजिक स्तर पर जरुर पत्रकारों को एक सम्मानजनक स्थान प्राप्त होता हैं |
पत्रकारों ने कलम कि ताकत को तोप कि ताकत से बड़ा सिद्ध किया हैं | पत्रकार से जुड़े लोगो का भी जीवन कम संघर्षपूर्ण नहीं होता हैं | कभी कभी तो उन्हें असामाजिक प्राणी भी कहा जाता हैं किसके मूल में उनका व्यस्त जीवन होता हैं| आमतौर पर पत्रकारों कि यही सुनने को मिलता हैं कि वो अपने परिवार और निकट करीबियों को समय नहीं दे पाते हैं | जीवन इतना संघर्षपूर्ण कि कल्पना नहीं की जा सकती हैं तब जाकर कोई ऐसी खबर ब्रेक होती हैं जो पूरे समाज को सुख देती हैं और सरकार व प्रशासन को की कलई खोलती हैं |
मजीठिया आयोग ने पत्रकारों के जीवन को एक सम्मान जनक स्तर पर लाने के लिए कई सिफारिशे की जिसका प्रभाव जमीनी स्तर पर नहीं देखने को मिला हैं | फलस्वरूप वो धन अर्जन के दूसरे विकल्प कि तलाश करते हैं जिसे लोग दलाली कहते हैं साथ ही पत्रकारिता के विश्वसनीयता को भी संदेहास्पद नजरों से देखा जाता हैं | पत्रकार का जीवन कितना संघर्षपूर्ण होता हैं इसकी कल्पना कोई साधारण इन्सान नहीं कर सकता हैं | 24×7 कि ड्यूटी और इसके साथ ये भी हैं कि पत्रकार कभी छुट्टी पर नहीं होता हैं उसे जहा कोई अप्रिय घटना दिखती हैं उसे तत्काल रिपोर्टिंग करनी हैं फिर चाहें वो काम पर हो या छुट्टी पर | सामाजिक स्तर पर जरुर पत्रकारों को एक सम्मानजनक स्थान प्राप्त होता हैं |
पत्रकारों ने कलम कि ताकत को तोप कि ताकत से बड़ा सिद्ध किया हैं | पत्रकार से जुड़े लोगो का भी जीवन कम संघर्षपूर्ण नहीं होता हैं | कभी कभी तो उन्हें असामाजिक प्राणी भी कहा जाता हैं किसके मूल में उनका व्यस्त जीवन होता हैं| आमतौर पर पत्रकारों कि यही सुनने को मिलता हैं कि वो अपने परिवार और निकट करीबियों को समय नहीं दे पाते हैं | जीवन इतना संघर्षपूर्ण कि कल्पना नहीं की जा सकती हैं तब जाकर कोई ऐसी खबर ब्रेक होती हैं जो पूरे समाज को सुख देती हैं और सरकार व प्रशासन को की कलई खोलती हैं |

No comments:
Post a Comment