Saturday, 2 April 2016

महाभारत धर्मयुद्ध या एक व्यक्तिगतयुद्ध

सनातन धर्म में महाभारत का अपना विशिष्ट स्थान हैं, जिसके अध्ययन के बाद मेरे मन में कई संदेह उत्पन्न हो गए | मैं खुद मानता हूँ कि “ सत्य परेशान हो सकता हैं, लेकिन पराजित नहीं “, असत्य पर सत्य कि सदैव जीत हों और धर्म का ध्वज सदैव फहराता रहें लेकिन महाभारत के मूल में मुझे सिर्फ व्यक्तिगत हित अहित कि लड़ाई दिखी जो अपने अपने स्वार्थ के लिए संघर्ष कर रहे हैं | क्या ये वाकई में एक धर्मयुद्ध था, क्या धर्म ही अधर्म को सरंक्षण प्रदान करता हैं | द्यूतसभा में घटित सभी घटना धर्मसंगत थी तभी तो भीष्म ने इसका विरोध नहीं किया, जो उस समय सबसे बड़े धर्मनिष्ठ थे | ये सर्वविदित हैं कि जुए में विजित वस्तु विजेता कि होती हैं और यही न्याय हैं | यहाँ अगर कोई दोषी हैं तो वो हैं पांडव | लेकिन फिर भी मैं कौरवों के कृत्य का संमर्थन नहीं करता और कोई भी सभ्य समाज में रहने वाला व्यक्ति नहीं कर सकता हैं और यही कारण हैं कि आज भी कोई माँ अपने बच्चे का नाम दुर्योधन नहीं रखती | ये उसके कर्मो का ही फल हैं |
            पांडव जिन्हें पुरे महाभारत में धर्म का प्रतीक माना गया हैं उनके कृत्य भी भविष्य के स्त्रियों के कष्ट का कारण बनी हैं | एक स्त्री और पांच पुरुषों से सम्बन्ध जिसे आज भी स्वीकार कर पाना मुश्किल होता हैं, उसे उस समय धर्मयुक्त बोलना मेरे समझ से परे हैं | इस युद्ध को जितने के लिये पांडवो ने भी कई अधर्म किये जिनमे प्रमुख हैं भीष्म कि हत्या जिसमे अर्जुन ने तब वाणों कि वर्षा कि जब उन्होंने अपने हथियार त्याग  दिये थे | हमने सदियों कि दासता स्वीकार कर ली लेकिन कभी निहत्थे पर वार नहीं किया | गुरु द्रोणाचार्य कि हत्या भी एक झूठ बोलकर कि जिसके बाद उन्होंने अपने हथियार त्याग दिए और उनका भी वध भीष्म कि ही तरह हुआ | कर्ण के वध में अर्जुन द्वारा किये अधर्म ने कर्ण कि महानता को कई गुना बढ़ा दिया | इन सभी घटनाओं से सिद्ध होता हैं धर्म भी बिना अधर्म किया विजित नहीं हो सकता जो भविष्य के लिये उचित नहीं समझा जा सकता हैं | दुर्योधन तो ऐलानिया अधर्मी था जिससे अपेक्षा करना बैमानी हैं लेकिन पांडवों के कृत्य को भी उचित ठहराना गलत हैं | कृष्ण जिन्होंने इस पुरे युद्ध में शस्त्र न उठाने कि प्रतिज्ञा कि थी अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर कभी सुदर्शन चक्र तो कभी रथ का पहिया उठा लेते थे इसके अलावा इन्होने एक बहुत बड़ा काम किया कि उन्होंने अर्जुन को गीता का ज्ञान देकर उसके सभी मोह को तोड़ दिया था वही कौरव पक्ष के भीष्म, द्रोणाचार्य, और महारथी कर्ण सभी मोह से ग्रस्त थे नहीं तो महाभारत का एक नया ही रूप हमारे सामने होता | शकुनी ने कहा था कि धर्म अधर्म जैसी कोई चीज नहीं होती हैं विजेता ही अपने हिसाब से धर्म कि व्याख्या करता हैं जिसे पराजित शासक मानता हैं यही कारन हैं कि पांड्वो के विजय ने उनके सभी कृत्यों को धर्मनिष्ठ सिद्ध कर दिया |
        इस विजय ने पांडव पक्ष को क्या दिया, एक द्रोपदी के अपमान का बदला लेने के लिये करोडो औरतो को विधवा बनाया गया तो लाखो बच्चों को अनाथ जिसका बोझ पांडव को शायद जीने ना देती हों | अपने संबंधियों कि हत्या का बोझ इसके साथ ही अपने पांचो पुत्रो को भी खोकर उन्होंने कैसी विजय पा ली और कैसी धर्म कि स्थापना कि वो मेरे सोच से प्रे हैं लेकिन में इसे किसी भी रूप में एक धर्मयुद्ध नहीं मान सकता जिसके मूल में एक स्त्री कि लालसा कि पूर्ति कि गयी हैं | दुर्योधन भले ही इस पूरे युद्ध में आलोचनाओ का शिकार हुआ हो लेकिन वो एक महत्वाकांक्षी, दूरदर्शी, कूटनीतिज्ञ था और इसी का परिणाम था कि भीष्म द्रोणाचार्य कर्ण अश्वथामा शल्य जैसे महारथी उसके साथ युद्ध कर रहे थे तो वही शकुनी को उस समय का चाणक्य कहे तो अतिश्योक्ति नहीं होगी और मैं तो यहाँ तक मानता हूँ कि कृष्ण न होते और उन्होंने छल न किया होता तो कौरवों को हराना टेढ़ी खीर होती...   ऐसे बहुत स संदेह हैं जो महाभारत कको एक व्यक्तिगत युद्ध बनाते हैं न कि धर्म युद्ध !

                                            Abhijeet Kumar Singh
                                   Mass Communication and Journalism

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