Friday, 8 April 2016

क्रिकेट का भूत, लोगो पर खूब


  हिमालय की तैयारियों से लेकर बंगाल की खाड़ी तक आप किसी से भी कह दे , भैय्या आपको IPL क्रिकेट का व्यसन है? वह यही कहेगा. बड़ा खतरनाक होता है यह क्रिकेट का भूत . जिस भी प्राणी पर यह सवार हो जाता है. उसका खाना पीना सब एक कोने में धरा रह जाता है. प्रेमी अपनी प्रेमिकाओ को, पतिगण अपनी धर्म पत्नियों को भूल जाते है इस भूत के कारण. उन्हें तो बस क्या स्कोर हुआ? यही याद रह जाता है |

कौन गया? यह याद रहता है. और जिस पर भी यह भूत सवार हो जाता है, उसकी रातो की नींद हराम हो जाती है. क्योकि हर करवट के साथ वह स्कोर सोचते और फिर उसके गणित में ही उलझता रहता है. खुदा- न -खास्ता उसे नींद आ भी गई, तो सपने में उसे सचिन या धोनी ही दिखाई देंगे.





 हिंदुस्तान में अधिकांश लोगो पर यदि कोई भूत सवार है तो वह है किरकिटिया भूत अर्थात क्रिकेट का भूत. क्या बच्चे, क्या बुढ्डे, क्या युवक, क्या युवतियाँ, आफिस के चपरासी से लेकर बॉस तक और सास  से बहु तक, सब पर सिर्फ एक रंग चढ़ा है और वह है क्रिकेट का रंग. 


आप क्रिकेट के भूत से ग्रसित किसी भी प्राणी से क्रिकेट के बारे में चाहे जो पूछिए, मजाल कि वह चुप रह जाए. मसलन क्रिकेट कब से शुरू हुआ? किसने लगातार तीन सेंचुरी मारी? गांगुली के पिताजी का नाम क्या है? कौनसा IPL खिलाडी सबसे तेज गेंद फैकता है? और तेज फैकता है तो किस गति से उसकी गेंद जाती है?


कपिल देव ने सन 1982  में अपने  मैच की पहली इनिगं में ४ थ्रो बाल पर किसको आउट किया था या गुगली क्या है? आदि सैकड़ो प्रश्नों का उत्तर आपको ऐसे मिलेगा मानो आप किसी कंप्यूटर से साक्षात्कार कर रहे हों.

मजाल कि कहीं से कहीं तक जरा सी भी गलती हो जावे. यहाँ तक कि कोई क्रिकेट खिलाड़ी कितनी बजे क्या करता है? इसका जवाब भी इस लोगो के पास मिल जावेगा. इसके विपरीत, इन्ही प्राणियों से इनके बाबा दादाओं के नाम पूछो अथवा क्रिकेट प्रेमी ऐसे कंप्यूटरराइज्ड दिमाग वाले किसी विद्यार्थी से उसके कोर्स के बारें में पूछों तो वह बगले झाकता नजर आएगा.

क्रिकेट के रंग में रंगें इन IPL क्रिकेट प्रेमियों का स्वभाव भी गिरगिट जैसा होता है. उदाहरण कोई खिलाड़ी यदि दनादन रन बनाता है, सेंचुरी पर सेंचुरी मारता है तो ये उसे सर पर बैठा लेते है. इनका बस चले तो उसका फोटो ट्रोफी में जड़वाकर उसे भी पहनना चालू कर दे और कहीं बेचारा खिलाडी एक दो मैच में बदकिस्मती से यदि रद्दी प्रदर्शन कर दे तो फिर देखो किस कदर भिन्नाते है. ये लोग? उसकी सारी इज्जत, एक मिनट में ताक पर रख देते है. उस खिलाडी के प्रति उनका पूर्व सम्मान नहीं कहाँ काफूर हो जाता है.



एक बात और है, जिन पर किरकिटिया भूत सवार होता है. वे क्रिकेट में इतने खो जाते है,  कि क्रिकेट के किसी मैच की जीत पर खूब उछलते है, मानो कोई रुका हुआ ब्याह निबट गया हो. उसके विपरीत, किसी मैच में हार जाने पर ये ही लोग ऐसा मातम मनाते है, मानो कि इसके चेहरों पर छाया हुआ मातम देखने लायक होता है.

पता नहीं क्रिकेट में सर से लेकर पाँव तक डूब कर यह पीढ़ी देश को क्या देना चाहती है? क्रिकेट का ज्ञान अथवा इसका ऐसा कौन सा पक्ष है, जो व्यावहारिक रूप से उपयोगी है? अगर क्रिकेट महज मनोरंजन है, तो इतने अधिक समय खाने वाले इस खेल के बजाय कम समय लेने वाले और अधिक मनोरंजक खेलों को इतना महत्व क्यों नहीं दिया जाता है.

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