कहने
को तो हम उस देश के बासी है जहाँ गंगा जमुनी तहजीब को तरजीह दी जाती है.
हमारे देश की पहचान विविधता में एकता की है जहा कई धर्म के लोग आपस में
प्रेम और भाईचारे से रहते हैं. हम ईद और दिवाली दोनों ही बड़े प्रेम से
मनाते है और पड़ोसी के घर कोई मरता है तो सबसे पहले हम पहुचते हैं बिना ये
सोचे की वो किस धर्म का है. मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है और उसकी सेवा ही
ईश्वर की सेवा हैं साथ ही प्रेम सभी धर्मो का आधार हैं. फिर कुछ कट्टरपंथी
लोग धर्म को तोड़ मरोड़कर धार्मिक विद्वेष फैलाने में कैसे सफल हो जाते है.
इसका सबसे बड़ा कारण हमारी धार्मिक संकीर्ण सोच है जो हमारे सोच को किसी भी दिशा में मोड़ देती हैं जिसका परिणाम मुजफ्फ़रनगर दंगा, गोधरा कांड. सिख दंगा जैसी सांप्रदायिक दंगो को जन्म देता हैं.धर्म को लेकर व्यापक सोच होनी चाहिये क्योंकी अगर हमारे पूर्वज इस सोच के साथ जीते तो इस्लाम, बोद्ध, जैन धर्म का उदय ही न हो पाता.
इसका सबसे बड़ा कारण हमारी धार्मिक संकीर्ण सोच है जो हमारे सोच को किसी भी दिशा में मोड़ देती हैं जिसका परिणाम मुजफ्फ़रनगर दंगा, गोधरा कांड. सिख दंगा जैसी सांप्रदायिक दंगो को जन्म देता हैं.धर्म को लेकर व्यापक सोच होनी चाहिये क्योंकी अगर हमारे पूर्वज इस सोच के साथ जीते तो इस्लाम, बोद्ध, जैन धर्म का उदय ही न हो पाता.
हमारे
समाज में जन्म के साथ ही कई प्रकार के बंधन मिलते हैं जैसे एक हिन्दू के
घर में जन्मा बच्चा हिन्दू है और मुस्लिम के घर पैदा हुआ बच्चा मुस्लिम और
यही स्तिथि लगभग सभी धर्मो में मौजूद हैं ये एक ऐसा बंधन है जो कही नहीं
दिखता लेकिन वो सबको बांधकर रखे हुए हैं. यह हमें विरासत में मिला हैं. एक
बच्चे के पैदा होने के साथ ही उसे ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र बना
दिया जाता हैं. उसपर संस्कारो के नाम पर कई रीती रिवाजो को थोपा जाता हैं
साथ ही उनके लिए बकायदे प्रशिक्षित किया जाता हैं. जो इंसान बिना कोई
प्रश्न किये उनका भलिभाती अनुसरण कर लेता है उसे समाज चरित्रवान धार्मिक और
संस्कारी कहता हैं वही जो बालक धर्म और रीति रिवाज का कट्टर अनुपालक नहीं
बनता उसे समाज अधार्मिक दर्जा देता हैं. क्या यही धार्मिकता है की अपने
रीती रिवाजों के प्रति सपक्ष रहे, उनका अन्धाधुकरण करे ?इन रिवाजो के
अनुपालक अपने इतर सोच रखने वालो को अधार्मिक और काफ़िर तक कह डालते हैं. साथ
ही संत समाज अपने विधर्मी अधर्मी पापी तथा दुष्ट तक कह डालते हैं. क्या
कोई धर्म इतना संकीर्ण हो सकता हैं?
हकीकत
ये हैं मजहब या धर्म को न समझ पाने के कारण ये एसी भ्रान्तिया पैदा होती
हैं हम कुछ प्रणालियों के अनुसरण को धर्म समझ लेते हैं जैसे किसी के लिए
रोज सुबह उठना नहा धोकर तुलसी पूजन करना तथा मंदिरों में धुप दिखाना धर्म
है तो किसी के लिए स्नान का त्याग करना ही धर्म है वही किसी ने रात में
भोजन न करने को धर्म बना लिया है तो किसी ने रात को ही रोजा खोलने को धर्म
बना लिया हैं.हकीकत में ये सब प्रणालिया हैं जो तात्कालिक समाज के प्रबुद्ध
लोगो ने समाज को संस्कारित करने के लिए प्रचलित किया था. यह ऐतिहासिक सत्य
हैं की आज विश्व में जितने भी युद्ध हुए है वो ज़र, जोरू, जमीन और धर्म का
नाम लेकर सदियों से होता रहा हैं, इनमे धर्म के लिए ही सबसे हिंसक और खुनी
संघर्ष हुए हैं. न केवल हुई है बल्कि आज भी हो रही हैं कही मोहल्लों में तो
कही जिलो में, धर्म के मुद्दे पर आज भी बहसबाजी चल रही हैं. अपने अपने
धर्मो के प्रति रागग्रस्त भावना ही दूसरे धर्म के प्रति बैर और कटुता की
भावना का प्रसार करता है जिसका परिणाम दंगो के रूप में देखने को मिलता हैं.
कहने को तो हम कहते है की मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर करना लेकिन इसके
आगे तुरन्त हम हिंदी और हिन्दुस्तान की बात करते हैं. अगर हमारा
हिन्दुस्तान सारे जहाँ से अच्छा हैं तो अन्य देशवासी क्यों न अपने देश को
अच्छा बताये. इसी श्रेष्ठता की लड़ाई में मजहबी खाई गहरी हो जाती हैं और
अलगाव पैदा करती हैं. यह सच है की कोई मजहब बैर करना नहीं सिखाता हैं लेकिन
ये भी सच हैं की कुछ धर्मांध व्यक्तियों ने निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए
दंगो को जन्म दिया हैं.
मजहबी
तालीम में पूरे विश्व को एक परिवार कहा गया हैं. भिन्न रंग रूप वेष भूषा
के कारण आदमी आदमी को नहीं बाटता हैं.वो धर्म धर्म नहीं जो इंसानों को आपस
में बाटे,उन्हें एक दुसरे से जुदा करे.जुदाई में भलाई कैसी?जिस कर्म से
इंसान की अंतरात्मा उद्वेलित हो वो सच्चा कर्म (ईमान)नहीं हो सकता हैं.
सच्चा मजहबी तो वो हैं जो स्वयं के कर्मो से लोगो के चित्त को शीतलता
प्रदान करता हैं. शांति में जीने वाला हो समभाव का आराधक हो सकता हैं जिसकी
मुस्कराहट लोगो को शीतलता प्रदान कर सकती हैं ..हर मजहब प्रेम की बात करता
हैं लेकिन इसका मतलब ये नहीं की सिर्फ अपने ही धर्म से प्यार करो क्योंकी
मेरे मजहब ने मुझे प्रेम करना सिखाया हैं. कूए से पानी पिया जाता है उसमे
बंधा नहीं जाता. हमे सभी धर्मो की अच्छी बातो का अनुसरण करना चाहिये
क्योंकी जो कट्टर है वो आतंक लायेगा. जो सर्वत्र पूजनीय है उससे किसी को भय
नहीं. भय से ही बैर पैदा होता है जो बाद में उन्माद को जन्म देता हैं.
तूफ़ान में भी वही पेड़ टिक पाता है जो झुकना जानता हैं सीधे खड़े पेड़ अक्सर
उखड जाते हैं....
मेरे
नजर में धर्म उस वृक्ष के सामान होता है जिसकी छाव में मानवता फलती व्
फूलती हैं उसे खुटा बनाने की कोशिश न करे. भले ही खुटा उसी वृक्ष की एक सखा
हो सकती है पर वास्तव में वो निर्जीव हो चुकी होती हैं ऐसे में हम कैसे
उसमे बंधकर मानवता का विकास केर सकते हैं..अगर मेरे विचारो से कोई समाज आहत
हो तो तहे दिल से माफ़ी लेकिन ये मेरे निजी विचार हैं...
अभिजीत कुमार सिंह
This comment has been removed by the author.
ReplyDeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDeleteNice artical and true thought sir
ReplyDeleteNice artical and true thought sir
ReplyDelete