आज भी देश कि 75% आबादी इन्ही गाँवों में मजदूर और किसान के रूप में रह रही हैं | मुझे ये कहने में भी कोई गुरेज नहीं हैं कि अभी तक देश के आधे गाँवों को मुलभुत सुविधाओ से भी महरूम रखा गया हैं |
देश कि अर्थव्यवस्था कि रीढ़ समझी जाने वाली कृषि आज भी उपेक्षित हैं | जहा आज देश के उद्योगपतियों को हजारों करोंडो का कर्ज देने में सरकारों को कोई दिक्कत नहीं होती लेकिन किसानो को लोन देने मे इतनी कागजी कर्यवाहियो से गुजरना पड़ता हैं कि मजबूरन उन्हें सूदखोरों के चंगुल में फसना पड़ता हैं | शायद इसी का परिणाम हैं कि किसान का पूरा जीवन कर्ज के दुष्चक्र में बिताना पड़ता हैं | सरकार की ऐसी पक्षपात पूर्ण रवैया क्यों ? कहने को तो हम उन्हें अन्नदाता कहते हैं लेकिन इनके उत्थान के लिए हमारे पास कोई योजना नहीं हैं. आज देश के किसानों को मात्र वोटों कि राजनीति में तोला जाता हैं | जिनके उत्थान का ख्याल सिर्फ चुनावी समय में याद आता हैं |
देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान कहकर देश के किसानो को सम्मान दिलाने का काम जरुर किया लेकिन जिस तरह से देश के विभिन्न हिस्सों से किसान आत्महत्या कर रहे हैं उससे सरकार कि संवेदनहीनता तो स्पष्ट रूप से दिख रही हैं | पूरा बुन्देलखंड घास कि रोटी खा रहा हैं जबकि पिछले 3 साल से वहाँ सूखा पड रहा हैं और सूबे के मुखिया सैफई में नाच देख रहे थे ये वही हाल था कि पूरा रोम जल रहा था और वह का शासक फ्रूट बजा रहा था | ऐसी स्थिति सिर्फ उत्तर प्रदेश भर की नहीं हैं बल्कि महाराष्ट्र, ओड़िसा, मध्य प्रदेश, बिहार के किसानों की भी हैं. मराठवाड़ा और विदर्भ कि स्थिति तो बुंदेलखंड से भी ख़राब हैं. वह के किसान तो बूंद बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं. आखिर उनकी सुध कौन ले. आजादी के 65 वर्ष बाद भी हमारे देश में कृषि को जुआ ही समझा जा रहा हैं. किसानों को सिचाई के लिए बरसात पर ही निर्भर रहना पड़ रहा हैं जबकि हम देश के विकास का ढिंढोरा पूरे विश्व में पीट रहे हैं |
आखिर ये कैसा विकास हैं जिसमे देश कि 75% आबादी उपेक्षित हैं जो जीवन जीने के लिए नित संघर्ष कर रहा हैं ऐसे में विकास के ये सभी दावे बेमानी लगते हैं | अभी हाल में वित्त मंत्री जेटली ने अपने बजट में किसानों को नये नये सपने दिखाए हैं इनका भविष्य कैसा होगा वो तो भविष्य ही बतायेगा |
अभिजीत कुमार सिंह
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग
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