देवो की भाषा समझी जाने वाली संस्कृत विश्व कि सबसे पुरानी भाषा हैं | इस बात को समूचे
विश्व ने स्वीकार कर लिया हैं | संस्कृत कई भाषाओ
कि जननी हैं, साथ ही इसके अध्ययन से भाषा में भी शुद्धता आती हैं | इसके साथ ही
संस्कृत से ही विज्ञान में प्रगति संभव हैं | यही कारण हैं कि
समूचे विश्व में संस्कृत की धूम मची हैं | वहाँ इसे स्वतंत्र
विषय के रूप में पढ़ा रहे हैं साथ ही इसे पढने वाले छात्रों की संख्या में भी
लगातार वृद्धि हो रही हैं, जो हम भारतीयों के लिए अच्छा संकेत हैं | इससे भारत को एक
बार फिर विश्व गुरु बनाने का सपना सच होता दिख रहा हैं | इसके अलावा तीन और
ऐसी चीज हैं जो भारत को भविष्य में पूरे विश्व का सिरमौर बनाने में सहायक होगी | इसमें सबसे पहला और
बड़ा नाम हैं भारतीय योग, आयुर्वेद, और कर्मकांड | ये तीनो ऐसी चीजे
हैं जो बड़ी ही तेजी से पूरे विदेशियों के मन में घर कर रही हैं |
इसके विपरित अपने देश के उत्तर प्रदेश कि बात करे जहाँ से इसका उद्गम माना
जा सकता हैं वही यह सर्वाधिक उपेक्षित हैं | एक समय था जब काशी, प्रयाग, मिर्जापुर, मथुरा गोरखपुर
इसके केंद्र हुआ करते थे | यहाँ के मठो व संस्कृत विद्यालयों से संस्कृत के
समवेत स्वर सुने देते थे लेकिन इस उपभोक्तावादी दौर में संस्कृत लुप्त होती जा रही
हैं | इसी का परिणाम हैं कि संस्कृत पढने वाले छात्रों की संख्या में
दिनोदिन कमी आ रही हैं, और स्तिथि ये हैं कि कई संस्कृत विद्यालय अब बंदी कि कगार पर
हैं | कहने को सूबे में इनकी संख्या 536 हैं, जिसमे अकेले प्रयाग में 41
हैं |
सरकार कि उदासीनता का आलम ये हैं कि यहाँ 1992 से अब तक कोई नियुक्ति नहीं हुई हैं | कही एक शिक्षक हैं तो कही दो जो अपनी ज्ञान की गाडी दौड़ा रहे हैं | समाज में भी संस्कृत को लेकर अजीब सी धरना बनी हैं कि ये एक वर्ग विशेष कि भाषा हैं | इसका तकनीकी एवं प्रोद्योगिकी के विकास में कोई योगदान नहीं हैं | इसको पढ़कर कोई क्या कर सकता हैं | संस्कृत पढने वाले छात्र भी खुद को ठगा सा महसूस करते हैं | विद्यालयों के प्रधानाचार्य सरकार की उदासीनता को जिम्मेदार मानते हैं |
एक शिक्षक के अनुसार बच्चो को न तो छात्रवृत्ति मिलती हैं न ही समय पर किताबे जबकि आज भी बच्चे यहाँ जमीन पर ही पढाई करते हैं; और तो छोडिये लम्बे समय से तो विद्यालय के मरम्मत के लिए भी पैसे नहीं दिये गए हैं और यहाँ तो शिक्षक ही झाड़ू लगाये तो लगेगा अलग से कोई चपरासी तक नहीं दिया गया हैं | इस मुद्दे पर संस्कृत शिक्षा परिषद् के निरीक्षक आर. एन. शुक्ला ने भी इन बातो को स्वीकार किया हैं, साथ ही सरकार से सुधार कि अपेक्षा कि हैं |
सरकार कि उदासीनता का आलम ये हैं कि यहाँ 1992 से अब तक कोई नियुक्ति नहीं हुई हैं | कही एक शिक्षक हैं तो कही दो जो अपनी ज्ञान की गाडी दौड़ा रहे हैं | समाज में भी संस्कृत को लेकर अजीब सी धरना बनी हैं कि ये एक वर्ग विशेष कि भाषा हैं | इसका तकनीकी एवं प्रोद्योगिकी के विकास में कोई योगदान नहीं हैं | इसको पढ़कर कोई क्या कर सकता हैं | संस्कृत पढने वाले छात्र भी खुद को ठगा सा महसूस करते हैं | विद्यालयों के प्रधानाचार्य सरकार की उदासीनता को जिम्मेदार मानते हैं |
एक शिक्षक के अनुसार बच्चो को न तो छात्रवृत्ति मिलती हैं न ही समय पर किताबे जबकि आज भी बच्चे यहाँ जमीन पर ही पढाई करते हैं; और तो छोडिये लम्बे समय से तो विद्यालय के मरम्मत के लिए भी पैसे नहीं दिये गए हैं और यहाँ तो शिक्षक ही झाड़ू लगाये तो लगेगा अलग से कोई चपरासी तक नहीं दिया गया हैं | इस मुद्दे पर संस्कृत शिक्षा परिषद् के निरीक्षक आर. एन. शुक्ला ने भी इन बातो को स्वीकार किया हैं, साथ ही सरकार से सुधार कि अपेक्षा कि हैं |
सूबे में
ये स्थिति तब हैं, जब यहाँ समाजवादी सरकार हैं | जहां पूरे विश्व
में संस्कृत कि स्वीकारिता बढ़ रही हैं वहीँ सूबे में ये अपना दम तोड़ रही हैं | संस्कृत का सम्बन्ध
संस्कृति से है और संस्कृति का सम्बन्ध समाज से ऐसे में संस्कृत कि उपेक्षा से कही
ना कही भारतीय संस्कृत भी उपेक्षित हो रही हैं |
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