Sunday, 27 March 2016

योग, आयुर्वेद, कर्मकांड का वैश्विक केंद्र भारत



भारत विश्व कि सबसे प्राचीन मानव सभ्यताओं में से एक हैं | शिक्षा के क्षेत्र में आलम ये था कि ये पूरे विश्व का केंद्र था | हमारा विज्ञान, कला, साहित्य उच्च श्रेणी का था | इसी का परिणाम था, की भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था | इसके अलावा भारत को विश्व गुरु की भी संज्ञा प्राप्त थी | इसके बाद तो हमारे देश में ऐसे लुटेरे आये, जिन्होंने सिर्फ देश को लुटा ही नहीं बल्कि उसके विद्वता को ही तहस नहस कर दिया | आज जबकि पूरा विश्व अपने तकनीकी और प्रोद्योगिकी का दम्भ भरते हैं, वो हमारे वेदों पुरानो में सदियों पहले ही उसका उल्लेख मिल जाता हैं |

          जी हां, ये उनके लिए आश्चर्यजनक हो सकता हैं, पर हमारे लिए ये आम बात हैं | आज सदियों बाद एक बार फिर हम  विश्व गुरु बनाने कि चौखट पर हैं | पूरा विश्व एक बार फिर हमारे आगे नतमस्तक हो चूका हैं | जिस जीवन को सरल और स्थायी बनाने के लिए वो विकास के नए नए परिभाषा गढ़ते हैं, उसी को धता बताते हुए हमारे देश ने शांति को अपना नया हथियार बनाया हैं | इस बार हमारे कमान में योग, आयुर्वेद, हिन्दू कर्मकांड जैसे हथियार हैं जिसके प्रति लोगो का आकर्षण नित बढ़ रहा हैं |




        इनमे से योग की एक झलक तो 21 जून को विश्व योग दिवस के रूप में पूरे विश्व ने देखा था | ये हमारे विश्व गुरु बनाने कि पहली झलक थी | पूरे विश्व ने भारतीय योग का लोहा माना हैं | अब आयुर्वेद ने भी अपना लोहा मनवाना शुरू कर दिया हैं, जहाँ लोग अंग्रेजी दवाओ सौर उसके साइड इफ़ेक्ट से थक चुके हैं तो अंग्रेजी दवाओ की कीमत भी बहुत ज्यादा होती हैं, इसके अपेक्षा आयुर्वेद न सिर्फ कारगर हैं बल्कि इसके कोई साइड इफ़ेक्ट भी नहीं हैं | आयुर्वेद में असाध्य बीमरियो के हल मिल जाते हैं, जबकि इसकी कीमत भी कम होती हैं | तो वही भारतीय कर्मकांड का लोहा तो विश्व ने बहुत पहले ही मान ली हैं आज भी विदेशो में भगवा वस्त्र धारण किय हुए कई अंग्रेज मिल जाते हैं | आज भी ज्यादा अंग्रेजी पर्यटक भारतीय मंदिरों में दर्शन के उद्देश्य से ही भारत आते हैं और यहाँ से भारतीय परंपरा और संस्कारो कि सौगात अपने साथ ले जाते हैं |

Saturday, 26 March 2016

वंशवाद से लोकतंत्र के भविष्य को खतरा



भारत जो विश्व की सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में जाना जाता हैं, उसमे एक बार फिर राजतंत्र ने सेंध लगा दी हैं | भारत की आजादी लम्बी लड़ाई के बाद मिली, जीत के बाद लगा कि अब देश में कोई राजा नहीं कोई प्रजा नहीं, अब सब राजा होंगे सब प्रजा होगे | लेकिन आजादी के कुछ ही दशको के बाद लगने लगा कि नहीं अब देश में दूसरे तरह का राजतंत्र होगा, जिसमे जनता जनार्दन तो होगी लेकिन उसके हाथ खुले नहीं होंगे | जी हाँ में बात कर रहा हूँ देश में वंशवादी राजनीति के उज्जवल भविष्य की | इस तरह कि राजनीति कि शुरुवात नेहरु जी ने की | जिसे आज मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, करूणानिधि, चौधरी चरण सिंह का परिवार, राम विलास पासवान जैसे सरीखे नेता अपनाये हुए हैं. ये तो बस कुछ नाम हैं, जिनकी एक लम्बी कतार हैं |

                   
क्या हम ऐसा मान ले कि हमारे देश में नेताओं कि कमी हैं, जो देश कि सत्ता सिर्फ कुछ परिवारों के हाथ में होनी चाहिये | क्या कांग्रेस में प्रधानमन्त्री बनने कि योग्यता सिर्फ गाँधी परिवार को ही हैं ? क्या कांग्रेस पार्टी गाँधी परिवार कि खेती हैं, जिसपर सिर्फ नेहरु परिवार ही फसल काटेगा | कुछ ऐसा ही हाल हमारे मुलायम सिंह यादव का भी हैं जो खुद को नेताजी तो कहलाना पसंद करते हैं, लेकिन सूबे का मुखिया चुनने कि बात आई तो अपने बाद अपने बेटे को ही सूबे का मुखिया बना डाला | 


              निःसंदेह हर पिता अपने बेटे के लिए बेहतर भविष्य की कामना करता हैं, और उसके लिए प्रयास भी करता हैं लेकिन ये कैसा पुत्र मोह हैं कि इसके लिए देश के शासन कि बागडोर ही उसे तोहफे में दे दें | जनाब ये लोकतंत्र हैं ना कि राजतंत्र जिसे आप सिंहासन समझकर अपनों बेटो का राज्याभिषेक कर रहे हैं | ये हमारे देश के सवा सौ करोड़ आबादी वाली जनता के साथ धोखा हैं | आज देश की जो भी हालत हैं उसमे कही न कही इस वंशवादी राजनीति कि भी अपनी महती भूमिका हैं | आज जरुरत हैं देश को इस वंशवादी राजनीति के मिथक को तोड़ने कि जिससे कि देश को उस जगह पर ले जाया जा सके जहाँ गाँधी, बोस और अम्बेडकर साहब ले जाना कहते थे |       

Tuesday, 22 March 2016

दाव पेंच के पंजे में अन्नदाता



भारतीय राजनीति में किसानो की स्थिति किसी से छुपी नहीं हैं | महात्मा गाँधी ने स्पष्ट कहा था कि भारत कि आत्मा गाँवों में बसती हैं और भारत का विकास तभी संभव हैं जब गाँवों का विकास होगा | 

 आज भी देश कि 75% आबादी इन्ही गाँवों में मजदूर और किसान के रूप में रह रही हैं | मुझे ये कहने में भी कोई गुरेज नहीं हैं कि अभी तक देश के आधे गाँवों को मुलभुत सुविधाओ से भी महरूम रखा गया हैं | 

           देश कि अर्थव्यवस्था कि रीढ़ समझी जाने वाली कृषि आज भी उपेक्षित हैं | जहा आज देश के उद्योगपतियों को हजारों करोंडो का कर्ज देने में सरकारों को कोई दिक्कत नहीं होती लेकिन किसानो को लोन देने मे इतनी कागजी कर्यवाहियो से गुजरना पड़ता हैं कि मजबूरन उन्हें सूदखोरों के चंगुल में फसना पड़ता हैं | शायद इसी का परिणाम हैं कि किसान का पूरा जीवन कर्ज के दुष्चक्र में बिताना पड़ता हैं | सरकार की ऐसी पक्षपात पूर्ण रवैया क्यों ? कहने को तो हम उन्हें अन्नदाता कहते हैं लेकिन इनके उत्थान के लिए हमारे पास कोई योजना नहीं हैं. आज देश के किसानों को मात्र वोटों कि राजनीति में तोला जाता हैं | जिनके उत्थान का ख्याल सिर्फ चुनावी समय में याद आता हैं | 

देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान कहकर देश के किसानो को सम्मान दिलाने का काम जरुर किया लेकिन जिस तरह से देश के विभिन्न हिस्सों से किसान आत्महत्या कर रहे हैं उससे सरकार कि संवेदनहीनता तो स्पष्ट रूप से दिख रही हैं | पूरा बुन्देलखंड घास कि रोटी खा रहा हैं जबकि पिछले 3 साल से वहाँ सूखा पड रहा हैं और सूबे के मुखिया सैफई में नाच देख रहे थे ये वही हाल था कि पूरा रोम जल रहा था और वह का शासक फ्रूट बजा रहा था | ऐसी स्थिति सिर्फ उत्तर प्रदेश भर की नहीं हैं बल्कि महाराष्ट्र, ओड़िसा, मध्य प्रदेश, बिहार के किसानों की भी हैं. मराठवाड़ा और विदर्भ कि स्थिति तो बुंदेलखंड से भी ख़राब हैं. वह के किसान तो बूंद बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं. आखिर उनकी सुध कौन ले. आजादी के 65 वर्ष बाद भी हमारे देश में कृषि को जुआ ही समझा जा रहा हैं. किसानों को सिचाई के लिए बरसात पर ही निर्भर रहना पड़ रहा हैं जबकि हम देश के विकास का ढिंढोरा पूरे विश्व में पीट रहे हैं | 

आखिर ये कैसा विकास हैं जिसमे देश कि 75% आबादी उपेक्षित हैं जो जीवन जीने के लिए नित संघर्ष कर रहा हैं ऐसे में विकास के ये सभी दावे बेमानी लगते हैं | अभी हाल में वित्त मंत्री जेटली ने अपने बजट में किसानों को नये नये सपने दिखाए हैं इनका भविष्य कैसा होगा वो तो भविष्य ही बतायेगा |
                                                   
                                                                                  अभिजीत कुमार सिंह
                                                                            पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग          

Friday, 18 March 2016

ऊपर वाला सब देखता हैं

ऊपर वाला सब देखता हैं | जी हां जो कभी मुहावरा हुआ करती थी, आज वो बिल्कुल चरितार्थ हो रही हैं | तकनीकी ने जहाँ जीवन को सरल बनाया हैं, तो वही इस बात को भी सम्भव बना दिया हैं| मैं बात कर रहा हूँ सी.सी.टी.वी. कैमरा की जो कही भी हमें सार्वजनिक जगहों पर बड़ी ही आसानी से देखने को मिल जाती हैं | 

आजकल तो आधे से ज्यादा अपराध इसी से हल किये जा रहे हैं | चोरो में पुलिस से ज्यादा खौफ उपर वाले का हैं मतलब इन कैमरों का | जब प्रशासन ने सार्वजनिक जगहों पर लिखना शुरू कर दिया कि अपनी सुरक्षा अपने हाथ तब लोगो ने भी अपनी सुरक्षा का जिम्मा ऊपर वाले को दे दिया हैं | सबसे बड़ी बात ये हैं कि ये बाजार में 3000 से 20000 रुपये में उपलब्ध हैं और इसकी विश्वसनीयता पर कोई शक किया ही नहीं जा सकता हैं जब तक इससे कोई छेद-छाड़ नहीं किया जाये | न्यूज़ चैनल भी खूब इससे खबर बना रहे हैं | अभी हाल ही में बहु द्वारा पीटती सास की खबर ऊपर वाले की देन हैं, और अब तो आयेदिन इसी से ही खबरे बन रही हैं |
             
           सुरक्षा कि जिम्मेदारी तो जैसे उपर वाले ने ही संभाल ली हैं | कम्पनी हो या होटल या बैंक या फिर कोई बड़ी शिक्षण संस्थान  सभी जगह इसे बड़े ही आराम से देखा जा सकता हैं | अब लोग गार्ड रखने कि अपेक्षा इसे ज्यादा पसंद कर रहे हैं | अपराधियों में इसे लेकर काफी खौफ हैं | अब ये लोग रेकी करते समय इन कैमरों का खासा ध्यान रखते हैं | अब सरकारे भी चौराहो पर पुलिस बल तैनात करने के बजाय इन कैमरों की तैनाती कर रहे हैं, जिसका खौफ लोगो में पुलिस की अपेक्षा ज्यादा हैं | पुलिस को 50 थमाकर कोई भी नियम तोडकर भाग सकता था, लेकिन अब ऊपर वाले से कौन बचाए | अब तो विश्वविद्यालयों के कक्षाओं में भी इन कैमरों को लगाने की व्यवस्था की जा रही हैं, जिससे प्रोफेसरों को भी अनुशासन के दायरे में लाया जा सकें | देर से ही सही लेकिन अब हमारे पास ऊपर वाले का साथ हैं देखते हैं कि हमारे देश कि व्यवस्था कैसे नहीं बदलती है |    

Wednesday, 16 March 2016

भारत माता की जय बोलने में इतनी दिक्कत क्यों ?


संघ प्रमुख मोहन भागवत के भारत माता कि जय के बयान के बाद से ही इसपर इतनी राजनीति क्यों? जबकि इससे पहले राष्ट्रगान के बाद भारत माता कि जय बोली जाती थी चाहे वो कॉलेज में हो रही हो अथवा कोई सामाजिक संघटन के कार्यालयों में | इसमें न हिन्दू को कोई आपत्ति होती थी न मुसलमानों को लेकिन हाल फिलहाल में जिस तरह से इस मुद्दे का राजनीतिकरण हो रहा हैं, उससे सिर्फ देश में टूट हो रही हैं | 

 हमारे देश के मुसलमानों की देशभक्ति पर कभी शक नहीं किया जा सकता हैं | लेकिन कुछ मुसलमान नेता व धर्मगुरु अपने निजी स्वार्थ के पूर्ति हेतु देश के मुसलमानों को बरगलाते हैं | अगर इसी देश में अफजल गुरु, दाउद इब्राहीम, मेनन बंधू जैसे गद्दार पैदा हुए थे, तो इसी देश में अब्दुल हमीद, अब्दुल कलाम, असफाक उल्ला खान जैसे सरीखे देश भक्त भी पैदा हुए | जिन्होंने देश के लिये जान दी | उनके लिए पहले अपना देश था फिर मजहब | क्या बिना देश के कोई मजहब का अस्तित्व हैं | दारुल उलूम ने अभी हाल ही में फतवा जारी किया हैं कि भारत माता कि जय नहीं बोलना हैं | आखिर ऐसा कौन सा मजहब हैं जो एहसान फरोशी सिखाता हैं | 

 हम अपने इस जीवन देने के लिए रोज अल्लाह कि इबादत करते हैं, जबकि जिस जमींन पर बैठकर हम अल्लाह कि इबादत करते हैं तो उसकी जय करने में गुरेज क्यों? इसी का उपजा अनाज खाते हैं, इसी पर बहता पानी पीते हैं इसी के धूल में खेलकर हम अपना बचपन बिताते हैं, तो फिर इसकी इबादत करने में कैसी आपति | अगर यहाँ मीरजाफर जैसे गद्दार मुसलमान पैदा हुए हैं तो जयचंद जैसे गद्दार हिन्दू भी, ऐसे में किसी भी हिन्दू नेता को मुसलमानों के देशभक्ति पर अंगुली उठाने का हक़ नहीं हैं | 

आज जब पूरे देश में आतंकवाद जैसी समस्या पूरे विश्व में काल बनकर बैठी हैं ऐसे में भारतवर्ष में भारत माता कि जय के नाम पर विवाद हास्यास्पद लगता है | कुछ मुसलमान नेता खुद को इन मुसलमानों का हिमायती बताते हैं लेकिन आजतक उन्होंने इस कौम के सरपरस्ती व विकास के लिए क्या किया हैं, इसके जवाब में वो सिर्फ मुस्कुरा सकते हैं फिर चाहे वो औवेशी बंधू हो अथवा आजम खान साहब | कैमरे के सामने आग उगलने से कौम का विकास नहीं होता जनाब | मत भूलिये इस देश कि करोडो जनता ने आपको कुछ बोलने लायक बनाया हैं उनके विकास के लिए काम करो न कि उन्हें तोड़ने के लिये, हमारे देश के मुसलमानों को पता हैं उन्हें किसकी जय बोलना हैं; जिसपर उपजी रोटी वो खाते हैं अथवा उसकी जिसके वादों की  गूंज वो 5 साल तक सुनते हैं |
                                            भारत माता की  जय !               
                                                                              
                                                                                            अभिजीत कुमार सिंह 
                                                                                     मास कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म