हमारे संस्कृति की बड़ी विडम्बना हैं की एक तरफ हम महिलाओ को शक्ति और वत्सल का रूप मानते हैं. मातृदेवी के रूप में उनकी पूजा करते हैं साथ ही सभी देवताओ के नाम से पहले देवी का नाम बोलते हैं जैसे- राधेश्याम, सीताराम, पार्वतीशिव. लेकिन वही दूसरे तरफ रामायण युग से ही महिलाओ को ही अग्निपरीक्षा देनी पड़ रही हैं. पुरुष महिला के संघर्ष में हमेशा महिलाओ को ही झुकना पड़ता हैं. हर युग में औरत को ही अपनी पवित्रता क्यों सिद्ध करनी पड़ती हैं? अहिल्या को शिलाखंड में परिवर्तित कर दिया गया उस गलती के लिए जो उन्होंने की ही नहीं थी. इंद्र ने उनके पति का रूप बनाकर उनके साथ गलत किया तो उसमे अहिल्या को सजा क्यों ? सीता को रावण हर कर ले गया तो सीता की अग्निपरीक्षा क्यों ? अगर एक राजा का धर्म प्रजा की शंका दूर करना हैं तो एक पति का भी फर्ज हैं की वो अपनी पत्नी का साथ दे न की उसका साथ छोड़ दे क्योकी पति के दिये सात वचनों के भरोसे ही एक लड़की अपना घर बार छोडकर दूसरे घर जाती हैं.
आज सदियों बाद सबकुछ बदल चुका हैं लेकिन महिलाओ की स्तिथि अब भी वैसी ही हैं. आज हर घर में महिलाओ का शोषण हो रहा हैं की दहेज़ के नाम पर तो कही अपने कामुकता के नाम पर. आज हर चोराहे पर रावण हैं जो नजरो से रैप करते हैं लेकिन इस युग में न राम हैं और ना हनुमान. ऐसे में हर लड़की को खुद ही दुर्गा और काली बनना पड़ेगा.. हां ये जरुर हैं की इन्ही महिलाओ में ही कुछ ऐसे विभीषण भी हैं जिन्होंने महिलाओ की छवि खराब की हैं जो महिलाओ को मिले अधिकारों का दुरुप्रयोग करती हैं.. लेकिन अपवाद हर जगह होते हैं लेकिन इसका मतलब ये नहीं हैं की महिलाओ की स्तिथि में थोडा भी सुधार हुआ हैं..
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