Saturday, 9 January 2016

आरक्षण :वरदान या अभिशाप ??

भारतीय संविधान में आरक्षण की व्यवस्था का श्रेय बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी को जाता हैं. डॉ अम्बेडकर द्वारा दलितों के उत्थान के लिए किये गए कार्यो के लिए दलित समाज सदैव उनका ऋणी रहेगा लेकिन आज क्या आरक्षण की उपयोगिता हैं? क्या वाकई में ये दलितों के उत्थान में कारगर हुआ हैं? क्या इससे प्रतिभासाली बच्चो का शोषण नहीं हो रहा हैं? क्या वास्तव में आरक्षण देश के विकास में बाधक हो रहे हैं? आज आजादी के 68 साल बाद इन सभी सवालों पर विचार करने की जरुरत हैं क्युकी आरक्षण का लाभ कुछ परिवारों को ही मिल पा रहा हैं जैसे एक दलित परिवार में कोई बाबू बन गया तो फिर वो सिर्फ अपने परिवार को ही प्रमोट करता हैं वही पूरा दलित समाज आज भी वही खड़ा है जहा आज से 68 साल पहले खड़ा था.आरक्षण से क्या पुरे दलित सम्माज को प्रतिनिधित्व मिल जाता हैं मान लो मिल भी जाता हैं तो क्या वो उसका समुचित लाभ पूरा शोषित समाज उठा पाता हैं क्योंकी प्रथमतया उनमे ज्ञान की कमी होती हैं क्युकी उन्हें मिला हुआ पद उनकी योग्यता पर नहीं बल्कि आरक्षण पर मिला हैं. ऐसे व्यक्ति के हाथ में देश की कमान अर्थात विकास व् सुशासन की जिम्मेद्दारी किस प्रकार दी जा सकती हैं क्योंकी वह सदैव एक जाति समूह में बंधा रह जाता है जिससे रास्त्र को नुक्सान पहुचता हैं इससे समाज में विद्वेष की भावना का विस्तार होता हैं उदाहरण के रूप में बिहार के लालू प्रसाद यादव जी हैं जिन्होंने जात पात और आरक्षण की राजनीति कर के बिहार को 50 साल पीछे कर दिया हैं. जिससे उग्रवाद,नक्सलवाद जैसे संगठनो का जन्म होता हैं. आरक्षण का सबसे बड़ा दुष्परिणाम ये हैं की इससे प्रतिभावान छात्रों का शोषण होता हैं.एक व्यक्ति जिसने अव्वल प्रतिभा का प्रदर्शन किया परन्तु उसका चयन सिर्फ इसलिए रोक दिया जाए की वो सवर्ण हैं किस हद तक न्यायोचित हैं? हमारे राजनीतिज्ञ आरक्षण की वकालत करते हैं लेकिन जब कोई सर्जरी या ऑपरेशन करनी होती हैं तो विदेश में जाते है क्योंकी वो जानते हैं की उन्होंने जो डॉक्टर की फौज खड़ी की हैं वो तो आरक्षण की फसल हैं.इसके विपरीत प्रतिभावान छात्र जिनमे आसमान छुने की काबिलियत और कुछ कर गुजरने का हुनर होता हैं उनकी प्रतिभा को दबा दिया जाता हैं. परिणामस्वरूप वो अपने मार्ग से विमुख हो जाते हैं.जिस कारण देश में अपराध बढ़ते हैं अपने देश की गन्दी राजनीती का परिणाम होता है की उनमे से देश के प्रति प्रेम कम होने लगता हैं. इससे वो स्वहित को देशहित से ज्यादा तरजीह देने लगते हैं. हमारे राजनेता महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं उन्हें पुरुषो को समकक्ष खड़ा करने की बात करते हैं. वे पुलिस आर्मी सभी में उनके किये दरवाजे खोल रहे हैं पुरुष के लिए दोड़ 5 km हैं वही महिलाओ के लिए 3 km हैं साथ उनकी समय सीमा भी ज्यादा होती हैं. सभी जानते हैं की महिलाओ में पुरुष सा बल और धेर्य नहीं होता हैं साथ ही उनका शारीरिक संघटन भी पुरुषो के सामान नहीं होता हैं. मेरा प्रश्न यह हैं की अपराधी अपराध कर के भागेगा तो क्या वो महिला पुलिस को ज्यादा मौका देगा या धीरे धीरे भागेगा. देश की सुरक्षा में राजनीति नहीं करनी चाहिए. मैं महिलाओ की छमता को कम नहीं आक रहा हूँ बस उनकी उर्जा को सही दिशा में लगाने की बात कर रहा हूँ . 
बाबा साहब ने जिस समय संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की थी उस समाया उनका लोकतंत्र पर शंका करना लाजिमी था परन्तु भारत का लोकतंत्र विश्व की सबसे सबल लोकतंत्र में एक हैं ,जिसमे किसी के अधिकारो का हनन नहीं होता हैं. मैं मनाता हु की हमारे देश में दलितों का बहुत शोषण हुआ हैं, बहुत तरीके से उन्हें प्रताड़ित किया गया हैं. उनके सरंक्षण के लिए कठोर से कठोर नियमो व कानूनों का पक्षधर हूँ. दलित समाज व कमजोर वर्ग को सिक्षा के अधिक अवसर मिलने चाहिए साथ ही छात्रवृति व आवासों के माध्यमो से उन्हें और प्रोत्साहित करना चाहिए. उन्हें इस लायक बनाना चाहिये की वो मुख्यधारा से जुड़े न की आरक्षण की बैसाखी पकडाकर विश्व की दौड़ में दौड़ा दे ऐसे में हमारा हारना तो तय हैं. हमारे राजनेता अपनी राजनीति चमकाने के लिए समाज को बाटने के लिए आरक्षण की राजनीति करते हैं. हमारे बीच जातिवाद सम्प्र्यवाद जैसे बीजो को बोकर आपस में सत्ता का हस्तातरण करते हैं. वे समाज के सबसे पीछे खड़े व्यक्ति के विकास की बात करते हैं ,उनके मतों से सत्ता पर काबिज होते हैं फिर उन्ही का खून चूसकर अपनी तिजोरिया भरते हैं. उधाहरण के रूप में हम बहन मायावती को ही लेते हैं वो खुद को दलितों का सबसे बड़ा हिमायती बताती हैं और तीन बार उत्तर प्रदेश की सत्ता संभाल चुकी हैं लेकिन आज तक उन्हों\ने दलितों के उत्थान के लिए क्या किया वो सोच से परे हैं लेकिन हा उनके आय में उनके रहन सहन में उनके बंगले में जरुर विकास हुआ हैं लाखो के चप्पल पहनती हैं 200 करोड़ के बंगले में रहती हैं वही उनके आय में बेतहाशा वृद्धि हुई है जिसे छिपाने के लिए समय समय पर दलितों के अधिकारों को बेच देती हैं..आरक्षण वास्तव में किसको लाभ पहुचा रहे हैं? ये समाज को बाट रहे हैं साथ ही आपस में जहर घोल रहे हैं. इससे शिक्षित बेरोजगारों की संख्या में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हो रही हैं जो देश के सुनहरे भविष्य के खिलाफ हैं.. वास्तव में आरक्षण का लाभ मुट्ठीभर दलित ले रहे हैं ऐसे में इसकी पुनः समीक्षा होनी चाहिये जिसमे या तो आरक्षण आर्थिक पर होना चाहिये या तो ये होना चाहिये की एक बार जिस परिवार को आरक्षण का लाभ मिल गया उसे दोबारा आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिये ऐसे में आरक्षण का लाभ सभी लो मिल सकेगा जिसे बाद में पूर्ण रूप से ख़त्म कर देना चाहिये.... 

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