Wednesday, 7 December 2016

सपा- कांग्रेस गठबंधन से होगा यू.पी चुनाव में बड़ा उलटफेर


उत्तर प्रदेश में आगामी समय में चुनाव है और नेताओ का दल बदलने का क्रम भी शुरू है | ऐसे में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के संभावित गठबंधन की खबरों ने विरोधियो की नींदे जरुर उडा दी है | सपा जिसके पास अखिलेश यादव जैसा बेदाग़ चेहरा है और इसके साथ ही पिछले 5 साल में सूबे में किया गया विकास का काम है | वही मुलायम सिंह यादव जैसा राजनीती का प्रकांड विद्वान है, जिसकी जमीनी पकड़ से कोई भी राजनितिक विश्लेषक गुरेज नहीं कर सकता है | हाल फिलहाल में जिस तरह से सपा परिवार में कलह की खबरे आई है, उसके बाद से अखिलेश यादव का मजबूत होना सपा के लिए संजीवनी का काम कर सकता है | क्योकी सपा के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व कबिनेट मंत्री शिवपाल यादव की छवि एक भ्रष्ट नेता की है | लेकिन ये भी उतना ही सच है की शिवपाल यादव की जमीनी पकड़ काफी मजबूत है | मिला जुलाकर समाजवादी पार्टी अब तक मजबूत स्थिति में है, लेकिन जिस तरह से बसपा समाजवादी पार्टी के परंपरागत वोट मुसलमानों पर सेंध लगाने का प्रयास कर रही है ऐसे में सपा का परेशान होना लाजिमी है | विपक्ष बार बार सूबे की कानून व्यवस्था पर सरकार को घेर रही है तो दूसरी तरफ समाजवाद पर परिवारवाद हावी होने का भी आरोप लगाती रहती है | जिसकारण सपा का जनाधार बहुत कमजोर हुआ है| सूबे के पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्र में सपा के जनाधार में भरी गिरावट देखने को मिल रही है |
     

   वही कांग्रेस की बात करे तो सूबे में उसकी स्थिति बहुत ही खस्ताहाल है| 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से जिस तरह से पुरे देश में जो कांग्रेस विरोधी हवा चली है, उसको रोकना उनके लिए नितान्त आवश्यक है | जिसके लिए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने भी एड़ी चोटी का जोर लगा रखा है, लेकिन उसका कोई बड़ा लाभ मिलता नहीं दिख रहा है | लेकिन ये भी उतना ही सत्य है की सूबे में राहुल की किसान यात्रा से किसानो में एक आशा जरुर बढ़ी है, क्योंकि कांग्रेस जनित मानरेगा और किसानो के कर्ज माफ़ी योजनाओ ने किसान वर्ग का बहुत भला किया था | लेकिन फिर भी कांग्रेस को अभी सूबे में अपनी जमीं तलाशने के लिए और जद्दोजहद करने की जरुरत है | ऐसे में दोनों का आपस में गठबंधन सूबे के राजनीति के लिए जरुरी हो गया है |
     

      वही दुसरे तरफ सूबे में बीजेपी के पास कोई चेहरा नहीं है, जिसे वो अपना मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर सके | वो अभी भी मोदी के चेहरे के ही सहारे है | जिसका परिणाम ये हो रहा है की नरेन्द्र मोदी ना तो प्रधानमन्त्री का काम ईमानदारी से कर पा रहे है और न संघटन का | बीजेपी अभी भी मोदी मैजिक का इंतज़ार कर रही है लेकिन नोटबंदी के बाद उसका भी कोई आसार नहीं दिख रहा है | इसलिए बीजेपी एक बार फिर राममंदिर और हिन्दुत्व का मुद्दा मुखर करने का प्रयास कर रही है | इसका कारण ये भी है की अपने ढाई साल के कार्यकाल में बीजेपी ने अपने एक भी वादे को पूरा नहीं किया है | महंगाई जस की तस है, काला धन विदेशो से अब तक नहीं आ सका है और देश के सैनिक अब भी सरहदों पर मर रहे है | जबकि जनता का ध्यान इन मुद्दों पर ना जाये इसलिए प्रायोजित खबरे चलाई जाती है जैसे- लव जिहाद, गौ मांस, सहिष्णुता का मुद्दा तो कभी जे.एन.यू का मुद्दा | इन सबमे उलझ कर न जनता इनसे सवाल कर पा रही है और ना ये जवाब देने को बाध्य है |
    

       अब बारी आती है बसपा की जो सिर्फ एक चेहरे के ही इर्द गिर्द घुमती है जिसका नाम है मायावती | हाल फिलहाल में इनके कई बड़े नेता इनका साथ छोड़कर दुसरे दलों में चले गए और आरोप भी लगा है की वो टिकट वितरण में पैसो का लेन देन करती है | लेकिन फिर भी इनकी ताकत को कम आकना विपक्षियो को भरी पद सकता है | इनके पिछले कार्यकाल में इन्होने कई हिटलर शाही काम किये थे जिसका परिणाम था की इन्हें सत्ता से बेदखल होना पड़ा |  लेकिन फिर भी इन्होने सूबे की कानून व्यवस्था को दुरुस्त रखा और कई माफियाओं को जेल में डाल दिया | भले ही ये काम उन्होंने बदले में किया हो, पर इसका लाभ जनता की जरुर मिला था |लेकिन इनकी दिक्कत भी ये है की इनके मुस्लिम प्रेम ने ब्राहमण समाज को इनसे दूर कर दिया है जिसके जुगलबंदी से इन्होने 2007 में सरकार बनायी थी |

     
        
      ऐसे में कांग्रेस सपा का गठजोड़ सूबे की राजनीति में एक नया मोड़ ला सकती है | अखिलेश की तमाम किसानो के हित की योजनाओं ने उन्हें इस वर्ग में काफी लोकप्रिय बना दिया है तो वहो दुसरे तरफ से कांग्रेस के जुड़ने से मुसलमानो में भी एक विश्वास पैदा होगा | सूबे के उन क्षेत्रो में जहा वो अभी पीछे चल रही है वह उसे थोडा संजीवनी भी मिल जायेगी इसके साथ ही राहुल और अखिलेश दो युवा चेहरे है जिनके मिलने से युवाओं की भारी संख्या में जुड़ने की आशा की जा सकती है इसके अलावा डिम्पल और प्रियंका गाँधी की जुगलबंदी मायावती के प्रभाव को कम करने में काफी सहायक सिद्ध हो सकती है | सूबे में किसकी सरकार बनेगी ये तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन जिसकी भी बने सूबे में विकास ही उसका एजेंडा हो न की धार्मिक उन्माद और संकीर्णता |       

Monday, 11 April 2016

भाजपा की कथनी और करनी में अंतर क्यों ?



    14 वी लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी को ऐतिहासिक विजय मिली, जिसके बाद लोगो को लगा कि अब आर.एस.एस और भाजपा की नीतियों को पंख लगेंगे | जिन मुद्दों को लेकर भाजपा ने विपक्ष में बैठकर विरोध करती थी, उन्ही मुद्दों को शासन में आने के बाद न केवल लागू कर दिया हैं बल्कि अपने फैसलों पर पीठ भी थपथपा रही हैं|
  जो भाजपा हमेशा से कांग्रेस को उसकी पकिस्तान नीति कि आलोचना की, जबकि संघ तो एक कदम आगे जाकर पकिस्तान को हमेशा भारत के लिए ख़तरा माना; उस पाकिस्तान के प्रति मोदी की नरम नीति भाजपा के कथनी और करनी में भेद की झलक दिखलाती हैं | 

  यही भाजपा थी, जो कभी धारा 370 का विरोध करती थी और मानती थी कि एक देश में दो संविधान नहीं होना चाहिये | आज जबकि राज्य में जब भाजपा गठबंधन की सरकार हैं, तो इस कानून को ठन्डे पानी में डाल दिया हैं | इसके अलावा विपक्ष में बैठकर जिस मनेरेगा और एफ.डी.आई का पुरजोर विरोध किया था, आज इसी का पुरजोर समर्थन करते हैं बल्कि इसपर अपनी पीठ भी थपथपाती है | इसे सत्ता में बैठने कि मजबूरी समझा जाये या फिर भाजपा ने अपने सिधान्तो से समझौता कर लिया हैं | 

       जिस आरक्षण के हालिया स्वरुप की संघ ने आलोचना की और नए सिरे से आरक्षण के समीक्षा की वकालत करती रही हैं, उसी भाजपा शासित हरियाणा सरकार ने जाटो को न सिर्फ आरक्षण दे डाली हैं बल्कि और दूसरे राज्यों में भी आरक्षण कि सुगबुगाहट तेज कर दी हैं, जिसमे गुजरात के  पटेल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों का आरक्षण आन्दोलन प्रमुख हैं |
                      
     जिस महंगाई और काले धन के मुद्दे को लेकर भाजपा ने लोकसभा का चुनाव लड़ा था आज सत्ता में आने के दो साल बाद भी देश में न तो कोई काला धन देश में वापस आया और न ही महंगाई पर कोई लगाम लगाईं | आज जबकि पूरे विश्व में पेट्रोल कि कीमत अपने न्यूनतम स्तर पर हैं, तब भी हमारे देश में पेट्रोल कि कीमत आसमान छू रही हैं | दाल गरीबो के थाली से दूर जा रही हैं, तो वही दूसरे आम जीवन कि चीजे भी आम लोगो कि पहुँच से दूर जा रहे हैं | 
     
    ऐसे में मोदी सरकार और कांग्रेस सरकार में क्या अंतर हैं, जिसपर भरोसा कर के जनता भाजपा को 2017 के चुनाव में यू. पी, उत्तराखंड और पंजाब की सत्ता पर भाजपा को काबिज करेगी | अब न तो भाजपा के पास कोई करिश्माई नेता हैं, और न ही कोई अच्छे जुमले, जिसको सुनकर लोग भाजपा पर फिर से भरोसा करेंगे |        

Saturday, 9 April 2016

इस रात की कोई सुबह नहीं......


आजादी के 68 साल बाद भी हमारा समाज दो वर्गो में बंटा हैं जिनमे एक के पास सारी सुविधाये उपलब्ध है तो वही एक जीने के लिए रोज जद्दोजहद कर रहा हैं. अथक परिश्रम के बाद वो दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पा रहा हैं. उनका परिवार शिक्षा स्वास्थ्य और सुविधाओ से महरूम है, जिन्हें समाज मजदूर कहता है. इन मजदूरो का कोई इतिहास नहीं है लेकिन हर इतिहास इनके बिना अधूरा हैं. मजदूर का पर्याय उनसे हैं जो मजे से दूर हो जिन्होंने जीवन में कोई सुख न देखा हो, वो गुमनामी में पैदा होता है और गुमनामी में ही मर जाता हैं.


   मजदूरो के हितो रक्षा के लिए राष्ट्रीय, अन्तराष्ट्रीय स्तर पर कई संघटन काम कर रहे है लेकिन आज भी उनके जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं हो सका है.आज भी उनका शोषण हो रहा है बस उसका तरीका बादल दिया गया हैं. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले के प्राचीर से अपने पहले अभिभाषण में श्रमेव जयतेकहकर जरुर एक आस जगाई थी लेकिन अभी हाल में हुए 46वे श्रमिक संघ की बैठक में वो आस भी धराशायी हो गयी. मोदी ने भी अपने पूर्ववर्ती शासको की तरह एक समिति का गठन कर डाला जो मजदूरो की वास्तविक स्तिथि, जीवन शैली का अध्ययन करेगी.

     मोदी खुद एक मजदूर और चाय बेचने वाले परिवार से निकलकर देश की राजनीति में शिखर पर आये हैं ऐसे में उन्हें खुद ज्ञात हैं की एक मजदूर किस तरह हर रात अपना पेट दबाकर सोता हैं. पिछले 68 साल से सिर्फ समितिया बन रही है जो एसी कमरों में बनती है और फिर ठन्डे बस्ते में चली जाती है.समय समय पर देश में कुछ ऐसे जननेता हुए जिन्होंने इन मजदूरो की कराह को देश की आवाज बना कर सत्ता के गलियारों तक ले गए जिनमे एम.एन.राय, राम मनोहर लोहिया,जय प्रकाश नारायण का नाम अमर रहेगा.सरकार जिस विकास का दावा करती है वो कही न कही किसी मजदूर की श्रम की कहानी होती है जो विकास की इमारत में मजदूर का खून पसीना बनकर बह रही है,फिर भी मजदूर गरीबी व बदहाली का बोझ ढो रही है. विकास में अमीर जमीं से आसमान पर चढ़ता है लेकिन मजदूर हमेशा अपने रोटी की लड़ाई पुराने ढंग से लड़ता है. वास्तव में मजदूर के कंधो पर विश्व की उन्नति का दारोमदार होता है, लेकिन विश्व का ऐसा कोई देश नहीं जहां मजदूरो का शोषण नही होता हैं. इन्हें अपनी मर्जी से न जीवन जीने का हक़ होता है और न सोचने का. समय समय पर मजदूरो की स्तिथि में आंशिक सुधर हुआ और उनका पारिश्रमिक तय किया जाने लगा, साथ ही उनके हितो की रक्षा के लिए मजदूर संघटनो का गठन होने लगा.

तकनीक के विकास ने मजदूरो की स्तिथि और ख़राब कर दी क्योंकी जिस काम के लिए 100 मजदूर लगते थे उसे मशीन चंद घंटो में पूरा कर देती है जिससे श्रमिको का मूल्य घटे लगा बेरोजगारी में बेतहाशा वृद्धि हुई जिसका परिणाम है की मजदूर को बेगारी करना पड़ रहा है. कारखानो में काम करते हुए मजदूर का शारीरिक नुकसान होने पर पर भी कंपनी मालिक कोई ख़ास भरपाई नहीं करते हैं. न्यायालयों का दरवाजा खटखटाने पर सिर्फ तारीख पर तारीख मिलती हैं.मजदूर न्याय की आस में अपनी जान दे देते हैं.
    
मजदूरो के लिए श्रम मंत्रालय का गठन किया गया हैं जो उनके हितो के लिए कानून बनाती है तथा उनके जीवन स्तर को सुधरने का प्रयास करती है इसके अलावा स्किल डेवलपमेंट मंत्रालय, महिला और बाल विकास मंत्रालय भी अप्रत्यक्ष रूप से इनके हितो के लिए ही काम करती है. बाल श्रम उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना के अंतर्गत लगभग 76 परियोजना चला रखी है जिससे लगभग 1.50 लाख बच्चो को लाभ मिला है साथ ही इन्हें विशेष स्कूलों में शिक्षा दी जा रही हैं. श्रम मंत्रायल ने राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना को देश के सभी जिलो में लागु करने की योजना बना रखी है. जिसके लिए 1500 करोड का प्रस्ताव रखा हैं. सरकार ने 57 उद्योगों को चिन्हित किया है तथा होटलों और ढाबो में काम करने वाले बच्चो को इस योजना में रखा गया है जिसके अंदर 9 से 14 साल के बच्चे आते है इसके अलावा सरकार ने साक्षरता मिशन चला रखा है जिसमे बच्चो को निशुल्क शिक्षा का प्रावधान किया गया है.

 14 अगस्त 1987 के बालश्रम नीति के अनुसार मजदूरी करते बच्चो के पुनर्वास की व्यवस्था की गयी है इसे उन राज्यों में लागू किया गया जहा बाल मजदूरी की ज्यादा शिकायते थी.इस कानून को कठोरता से लागु करने का प्रावधान था जिससे बाल मजदूरी को 10वी पंचवर्षीय योजना तक खत्म किया जा सके. फैक्ट्री कानून 1948 के अनुसार 14 से कम उम्र के बच्चो का काम करना निषिद्ध है साथ ही 15 साल से उपर के बच्चो को मेडिकल जांच के बाद ही काम पर रखा जा सकता है. वे सिर्फ 4 से 5 घंटे ही काम कर सकते है साथ ही उन्हें रात में काम करना निषेध है. इसी कानून के खंड 22(2) के अनुसार किसी महिला श्रमिक को प्राइम मूवर (मूल गति उत्पादक) या किसी भी मशीनरी के किसी भाग की सफाई लुब्रिकेट को समायोजित करने का अधिकार नहीं होगा यदि कम्पनी मालिक ऐसा करने को महिला को बाध्य करता है तो दंड का भागीदार होगा. फैक्ट्री एक्ट 1984 (कारखाना अधिनियम) के सेक्शन 27 के अनुसार कॉटन प्रेसिंग जिसमे कॉटन ओपनर काम करता है ऐसे कारखाने के किसी भाग में महिला श्रम पूर्णतः प्रतिबंधित है साथ ही सेक्शन 66(1)(बी) के अनुसार किसी कारखाने में महिला श्रमिक सुबह 6 से शाम 7 बजे के बीच ही काम करने की अनुमति है.




Friday, 8 April 2016

क्रिकेट का भूत, लोगो पर खूब


  हिमालय की तैयारियों से लेकर बंगाल की खाड़ी तक आप किसी से भी कह दे , भैय्या आपको IPL क्रिकेट का व्यसन है? वह यही कहेगा. बड़ा खतरनाक होता है यह क्रिकेट का भूत . जिस भी प्राणी पर यह सवार हो जाता है. उसका खाना पीना सब एक कोने में धरा रह जाता है. प्रेमी अपनी प्रेमिकाओ को, पतिगण अपनी धर्म पत्नियों को भूल जाते है इस भूत के कारण. उन्हें तो बस क्या स्कोर हुआ? यही याद रह जाता है |

कौन गया? यह याद रहता है. और जिस पर भी यह भूत सवार हो जाता है, उसकी रातो की नींद हराम हो जाती है. क्योकि हर करवट के साथ वह स्कोर सोचते और फिर उसके गणित में ही उलझता रहता है. खुदा- न -खास्ता उसे नींद आ भी गई, तो सपने में उसे सचिन या धोनी ही दिखाई देंगे.





 हिंदुस्तान में अधिकांश लोगो पर यदि कोई भूत सवार है तो वह है किरकिटिया भूत अर्थात क्रिकेट का भूत. क्या बच्चे, क्या बुढ्डे, क्या युवक, क्या युवतियाँ, आफिस के चपरासी से लेकर बॉस तक और सास  से बहु तक, सब पर सिर्फ एक रंग चढ़ा है और वह है क्रिकेट का रंग. 


आप क्रिकेट के भूत से ग्रसित किसी भी प्राणी से क्रिकेट के बारे में चाहे जो पूछिए, मजाल कि वह चुप रह जाए. मसलन क्रिकेट कब से शुरू हुआ? किसने लगातार तीन सेंचुरी मारी? गांगुली के पिताजी का नाम क्या है? कौनसा IPL खिलाडी सबसे तेज गेंद फैकता है? और तेज फैकता है तो किस गति से उसकी गेंद जाती है?


कपिल देव ने सन 1982  में अपने  मैच की पहली इनिगं में ४ थ्रो बाल पर किसको आउट किया था या गुगली क्या है? आदि सैकड़ो प्रश्नों का उत्तर आपको ऐसे मिलेगा मानो आप किसी कंप्यूटर से साक्षात्कार कर रहे हों.

मजाल कि कहीं से कहीं तक जरा सी भी गलती हो जावे. यहाँ तक कि कोई क्रिकेट खिलाड़ी कितनी बजे क्या करता है? इसका जवाब भी इस लोगो के पास मिल जावेगा. इसके विपरीत, इन्ही प्राणियों से इनके बाबा दादाओं के नाम पूछो अथवा क्रिकेट प्रेमी ऐसे कंप्यूटरराइज्ड दिमाग वाले किसी विद्यार्थी से उसके कोर्स के बारें में पूछों तो वह बगले झाकता नजर आएगा.

क्रिकेट के रंग में रंगें इन IPL क्रिकेट प्रेमियों का स्वभाव भी गिरगिट जैसा होता है. उदाहरण कोई खिलाड़ी यदि दनादन रन बनाता है, सेंचुरी पर सेंचुरी मारता है तो ये उसे सर पर बैठा लेते है. इनका बस चले तो उसका फोटो ट्रोफी में जड़वाकर उसे भी पहनना चालू कर दे और कहीं बेचारा खिलाडी एक दो मैच में बदकिस्मती से यदि रद्दी प्रदर्शन कर दे तो फिर देखो किस कदर भिन्नाते है. ये लोग? उसकी सारी इज्जत, एक मिनट में ताक पर रख देते है. उस खिलाडी के प्रति उनका पूर्व सम्मान नहीं कहाँ काफूर हो जाता है.



एक बात और है, जिन पर किरकिटिया भूत सवार होता है. वे क्रिकेट में इतने खो जाते है,  कि क्रिकेट के किसी मैच की जीत पर खूब उछलते है, मानो कोई रुका हुआ ब्याह निबट गया हो. उसके विपरीत, किसी मैच में हार जाने पर ये ही लोग ऐसा मातम मनाते है, मानो कि इसके चेहरों पर छाया हुआ मातम देखने लायक होता है.

पता नहीं क्रिकेट में सर से लेकर पाँव तक डूब कर यह पीढ़ी देश को क्या देना चाहती है? क्रिकेट का ज्ञान अथवा इसका ऐसा कौन सा पक्ष है, जो व्यावहारिक रूप से उपयोगी है? अगर क्रिकेट महज मनोरंजन है, तो इतने अधिक समय खाने वाले इस खेल के बजाय कम समय लेने वाले और अधिक मनोरंजक खेलों को इतना महत्व क्यों नहीं दिया जाता है.

Thursday, 7 April 2016

मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना ......

कहने को तो हम उस देश के बासी है जहाँ गंगा जमुनी तहजीब को तरजीह दी जाती है. हमारे देश की पहचान विविधता में एकता की है जहा कई धर्म के लोग आपस में प्रेम और भाईचारे से रहते हैं. हम ईद और दिवाली दोनों ही बड़े प्रेम से मनाते है और पड़ोसी के घर कोई मरता है तो सबसे पहले हम पहुचते हैं बिना ये सोचे की वो किस धर्म का है. मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है और उसकी सेवा ही ईश्वर की सेवा हैं साथ ही प्रेम सभी धर्मो का आधार हैं. फिर कुछ कट्टरपंथी लोग धर्म को तोड़ मरोड़कर धार्मिक विद्वेष फैलाने में कैसे सफल हो जाते है.

इसका सबसे बड़ा कारण हमारी धार्मिक संकीर्ण सोच है जो हमारे सोच को किसी भी दिशा में मोड़ देती हैं जिसका परिणाम मुजफ्फ़रनगर दंगा, गोधरा कांड. सिख दंगा जैसी सांप्रदायिक दंगो को जन्म देता हैं.धर्म को लेकर व्यापक सोच होनी चाहिये क्योंकी अगर हमारे पूर्वज इस सोच के साथ जीते तो इस्लाम, बोद्ध, जैन धर्म का उदय ही न हो पाता.

हमारे समाज में जन्म के साथ ही कई प्रकार के बंधन मिलते हैं जैसे एक हिन्दू के घर में जन्मा बच्चा हिन्दू है और मुस्लिम के घर पैदा हुआ बच्चा मुस्लिम और यही स्तिथि लगभग सभी धर्मो में मौजूद हैं ये एक ऐसा बंधन है जो कही नहीं दिखता लेकिन वो सबको बांधकर रखे हुए हैं. यह हमें विरासत में मिला हैं. एक बच्चे के पैदा होने के साथ ही उसे ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र बना दिया जाता हैं. उसपर संस्कारो के नाम पर कई रीती रिवाजो को थोपा जाता हैं साथ ही उनके लिए बकायदे प्रशिक्षित किया जाता हैं. जो इंसान बिना कोई प्रश्न किये उनका भलिभाती अनुसरण कर लेता है उसे समाज चरित्रवान धार्मिक और संस्कारी कहता हैं वही जो बालक धर्म और रीति रिवाज का कट्टर अनुपालक नहीं बनता उसे समाज अधार्मिक दर्जा देता हैं. क्या यही धार्मिकता है की अपने रीती रिवाजों के प्रति सपक्ष रहे, उनका अन्धाधुकरण करे ?इन रिवाजो के अनुपालक अपने इतर सोच रखने वालो को अधार्मिक और काफ़िर तक कह डालते हैं. साथ ही संत समाज अपने विधर्मी अधर्मी पापी तथा दुष्ट तक कह डालते हैं. क्या कोई धर्म इतना संकीर्ण हो सकता हैं?

हकीकत ये हैं मजहब या धर्म को न समझ पाने के कारण ये एसी भ्रान्तिया पैदा होती हैं हम कुछ प्रणालियों के अनुसरण को धर्म समझ लेते हैं जैसे किसी के लिए रोज सुबह उठना नहा धोकर तुलसी पूजन करना तथा मंदिरों में धुप दिखाना धर्म है तो किसी के लिए स्नान का त्याग करना ही धर्म है वही किसी ने रात में भोजन न करने को धर्म बना लिया है तो किसी ने रात को ही रोजा खोलने को धर्म बना लिया हैं.हकीकत में ये सब प्रणालिया हैं जो तात्कालिक समाज के प्रबुद्ध लोगो ने समाज को संस्कारित करने के लिए प्रचलित किया था. यह ऐतिहासिक सत्य हैं की आज विश्व में जितने भी युद्ध हुए है वो ज़र, जोरू, जमीन और धर्म का नाम लेकर सदियों से होता रहा हैं, इनमे धर्म के लिए ही सबसे हिंसक और खुनी संघर्ष हुए हैं. न केवल हुई है बल्कि आज भी हो रही हैं कही मोहल्लों में तो कही जिलो में, धर्म के मुद्दे पर आज भी बहसबाजी चल रही हैं. अपने अपने धर्मो के प्रति रागग्रस्त भावना ही दूसरे धर्म के प्रति बैर और कटुता की भावना का प्रसार करता है जिसका परिणाम दंगो के रूप में देखने को मिलता हैं. कहने को तो हम कहते है की मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर करना लेकिन इसके आगे तुरन्त हम हिंदी और हिन्दुस्तान की बात करते हैं. अगर हमारा हिन्दुस्तान सारे जहाँ से अच्छा हैं तो अन्य देशवासी क्यों न अपने देश को अच्छा बताये. इसी श्रेष्ठता की लड़ाई में मजहबी खाई गहरी हो जाती हैं और अलगाव पैदा करती हैं. यह सच है की कोई मजहब बैर करना नहीं सिखाता हैं लेकिन ये भी सच हैं की कुछ धर्मांध व्यक्तियों ने निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए दंगो को जन्म दिया हैं. 

मजहबी तालीम में पूरे विश्व को एक परिवार कहा गया हैं. भिन्न रंग रूप वेष भूषा के कारण आदमी आदमी को नहीं बाटता हैं.वो धर्म धर्म नहीं जो इंसानों को आपस में बाटे,उन्हें एक दुसरे से जुदा करे.जुदाई में भलाई कैसी?जिस कर्म से इंसान की अंतरात्मा उद्वेलित हो वो सच्चा कर्म (ईमान)नहीं हो सकता हैं. सच्चा मजहबी तो वो हैं जो स्वयं के कर्मो से लोगो के चित्त को शीतलता प्रदान करता हैं. शांति में जीने वाला हो समभाव का आराधक हो सकता हैं जिसकी मुस्कराहट लोगो को शीतलता प्रदान कर सकती हैं ..हर मजहब प्रेम की बात करता हैं लेकिन इसका मतलब ये नहीं की सिर्फ अपने ही धर्म से प्यार करो क्योंकी मेरे मजहब ने मुझे प्रेम करना सिखाया हैं. कूए से पानी पिया जाता है उसमे बंधा नहीं जाता. हमे सभी धर्मो की अच्छी बातो का अनुसरण करना चाहिये क्योंकी जो कट्टर है वो आतंक लायेगा. जो सर्वत्र पूजनीय है उससे किसी को भय नहीं. भय से ही बैर पैदा होता है जो बाद में उन्माद को जन्म देता हैं. तूफ़ान में भी वही पेड़ टिक पाता है जो झुकना जानता हैं सीधे खड़े पेड़ अक्सर उखड जाते हैं....
मेरे नजर में धर्म उस वृक्ष के सामान होता है जिसकी छाव में मानवता फलती व् फूलती हैं उसे खुटा बनाने की कोशिश न करे. भले ही खुटा उसी वृक्ष की एक सखा हो सकती है पर वास्तव में वो निर्जीव हो चुकी होती हैं ऐसे में हम कैसे उसमे बंधकर मानवता का विकास केर सकते हैं..अगर मेरे विचारो से कोई समाज आहत हो तो तहे दिल से माफ़ी लेकिन ये मेरे निजी विचार हैं... 
                                                                                             अभिजीत कुमार सिंह

साईं बाबा पर इतनी हाय तौबा क्यों ???

 साईं बाबा को भी हमारे देश में भगवान कि तरह पूजा जाता हैं. महाराष्ट्र में इनकी सबसे ज्यादा पूजा होती हैं जो अब धीरे- धीरे पूरे देश में शुरू हो गई हैं. एक आकड़ो को माना जाये तो आज साईं भगवान् के नाम पर बनाया गया साईं ट्रस्ट भारत कि सबसे रईस ट्रस्ट हैं और साईं बाबा जो आजीवन एक फकीर के तरह जीवन बिताये थे आज वो देश के सबसे अमीर भगवान बन चुके हैं. यही कारण हैं कि हमारे देश के बड़े धर्मगुरुओं की  चिंताये बढ़ गयी है. जहाँ एक तरफ उनकी दुकाने बंद हो रही हैं तो वही उनके चढ़ावे में आने वाली धनराशि की भी कमी हो रही है.


   यही कारण हैं कि विगत कुछ समय से द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती साईं बाबा के पीछे हाथ धो कर पड गए हैं. कभी उन्हें भगवान् मानने से इन्कार कर देते हैं तो कभी धर्मसंसद में उनके प्रतिनिधि को बेज्जत किया जाता हैं. माना कि साईं भगवान् के नाम पर उनके भक्त अकूत सम्पति कमा रहे हैं. लेकिन इससे किसी धर्माचार्य को क्या आपत्ति ? यही खेल तो सभी मंदिरों में चल रहा हैं. हमारे देश में सबको अपना भगवान् चुनने का अधिकार है. अब तो स्वरूपानंद ने एक कदम और आगे बढकर बढकर ये कह दिया हैं कि मराठवाडा और विदर्भ में होने वाले सूखे और जलसंकट के लिये साई कि पूजा ही जिम्मेदार हैं.

 जहाँ एक तरफ पूरा महाराष्ट्र जल कि एक एक बूंद के लिए तरस रहा हैं ऐसे में स्वरूपानंद का ये बयान काफी दुखद हैं. आज जब समाज में आमुलचूल  सुधार कि जरुरत हैं, ऐसे में धर्माचार्य को सामाजिक आन्दोलन करना चाहिये. उसके बदले वो व्यर्थ के चोचले बाजी में उलझे हुए हैं. ये हमारे देश का दुर्भाग्य हैं कि हमारे धर्म का ध्वज ऐसे महापुरुषो के हाथ में हैं. इनकी सोच के स्तर का आकलन इस बयान से भी लगाया जा सकता हैं कि शनि के पूजा के लिए औरतो ने 400 साल पुरानी परम्परा को तोडकर समानता कि नयी इबारत लिखी उनका होसला बढाने के बजाय ये कह दिया कि उनपर शनि कि नजर पड गयी हैं अब महिलाओं के साथ दुराचार और शारीरिक शोषण जैसी अमानवीय घटना ज्यादा होगी. ये कैसे धर्माचार्य हैं अब देश कि जनता को तय करना हैं. . 

बिहार सरकार का अब तक का सबसे बड़ा फैसला


अभी हाल ही में संपन्न बिहार चुनाव में मोदी के विजय रथ को रोकने वाली महागठबंधन सरकार ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया हैं जिसकी धमक से पूरा बिहार गुलजार हो उठा हैं | बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने चुनावी वादे को अमली जामा पहनाते हुए पूरे बिहार में देशी और विदेशी शराब पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया हैं | वह भी तब जबकि बिहार सरकार इन शराबों से राजस्व के रूप में मोटी रकम वसूलती थी | जी हाँ शराब किसी भी राज्य में राजस्व का एक बड़ा हिस्सा होती हैं इसी कारण कोई सरकार इसके पूर्ण प्रतिबन्ध के सन्दर्भ में नहीं सोचती हैं | ऐसे में नीतीश कुमार के इस साहसिक फैसले कि सराहना होनी चाहिये | वह भी तब जबकि बिहार एक बीमारू राज्यों कि श्रेणी में आता हैं | आयेदिन लोग देशी शराब पीकर बीमार पड़ते थे अथवा मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे | ऐसे में नीतीश कुमार के इस फैसले से उन परिवारों को संतोष प्राप्त होगा जिनके परिवार को रोज शराब थोडा थोडा करके पीता था |
                                   नीतीश कुमार हमेशा से ही अपने कड़े फैसलों के लिए जाने जाते हैं लेकिन महागठबंधन सरकार बनने के बाद ये आशा की जा रही थी कि अब नीतीश कि धार कुंद हो जायेगी | नीतीश के इस फैसले ने सबको गलत साबित कर दिया हैं | अब ये देखना और दिलचस्प होगा कि नीतीश सरकार अपने इस फैसले को जमीनी स्तर पर कैसे लागू करवाती हैं क्योंकी किसी फैसले के क्रियान्वयन का काम प्रशासन का होता हैं | नीतीश देश के उन चुनिंदों नेताओं में से एक हैं जिनकी छवि विकास पुरुष के रूप में हैं | बिहार अभी भी बहुत पीछे हैं और ख़ास तौर पर रोजगार के क्षेत्र में | क्योंकि आज भी लाखो बिहारी रोजगार कि तलाश में प्रतिदिन अपने घर को छोडकर दूसरे राज्यों में जाते हैं | बिजली, शिक्षा, सड़के भी मौलिक जरूरते हैं लेकिन इनका विकास धीरे-धीरे हो रहा हैं | भाजपा चुनाव के दौरान जिस जंगलराज का भय दिखाकर चुनाव जितना कहते थे वो अभी तक उसकी कोई ख़ास झलक दिखी नहीं हैं ऐसे में हम यही अपेक्षा करेंगे के बिहार के विकास कि जिस गति को नीतीश ने पिछले 10 वर्षो में तेज की थी उसकी धार महागठबंधन सरकार में कुंद नहीं होगी | बिहार के पहचान आदि काल से ही शिक्षा और सम्पन्नता का केंद्र रहा था और अब इसकी पुरानी गरिमा को वापस दिलाने का काम नीतीश सरकार को करना हैं |