Saturday, 9 January 2016

परम्परा बनी जी का जंजाल

भाईयों इसे कहते है कृतघ्नता, अभी 21 जून को भारत योग दिवस मना रहे हैं, जिसमें सूर्य नमस्कार भी है | जिसका विरोध असदुद्दीन ओवैसी और कई इस्लामिक नेताओं ने जताया है | जिसे लेकर भारत के लोगों में कई प्रकार की बातें चल रही है | इस पर मै ध्यान दिलाना चाहूँगा सभी भारत वासिओं को, की जिसको करना हो वह करें जिसको नही करना हो न करें, विरोध किस हैसियत से कर रहे हैं ? अथवा किस अधिकार से कर रहे हैं ? इन को यह अधिकार दिया किसने की भारत के बहु संखक जिस ऋषि परम्परा को मानते आ रहे हैं उसका विरोध, पाकिस्तान पंथियों के कहने पर किया अथवा माना जाय ? यह लोग जो नमाज पढ़ते हैं उसका विरोध किसी भी हिन्दुओं ने किया है ? जब की यह परम्परा भारत का नही अपितु अरब का है | भारत में रह कर अरबी परम्परा को मनाने में इन्हें शर्म नही है ? किन्तु भारत में रह कर भारतीय परम्परा को मनाना इन लोगों के पास हराम है |
तो हिन्दू क्या कर रहा है उसका विरोध यह किस लिए कर रहे हैं ? यह लोग कितना बड़ा अहसान फरामोश हैं देखें जिस सूर्य से लाभ ले रहे हैं उस का शुक्रिया अदा करना भी यह गुनाह मान रहे हैं | यही तो कारण है की यह रहते हैं भारत में किन्तु हमेशा भारत विरोधी गति विधि इनकी रही है | भारत में पूरब दिशा को शुभ मानते है कारण प्रात: उठते ही सूरज हम उसी दिशामें देखते हैं | और यह उसका उल्टा पश्चिम दिशा को शुभ मानते है | पश्चिमी संस्कृति को मानते हैं भारत में रह कर पश्चिमी परम्परा को मानते हैं, तो क्या कभी किसी हिन्दू ने इस का विरोध किया ?
यही कारण बना भारत में ही खड़ा हो कर मुसर्रत पाकिस्तान का नारा लगा रहा है किसी भी मुस्लिम नेताओं ने इसका विरोध नही किया, और ना किसी सेकुलर वादी नेता ने ? इस से स्पस्ट है की यह लोग भारत के साथ छल कर रहे हैं | और यह आज से नही किन्तु इस्लाम के जन्मकाल से इन इस्लामिओं को यही शिक्षा कुरान में अल्लाह ने दिया है, जिसपर यह लोग अमल करते आ रहे हैं |
जिस सूर्य से प्रकाश ले रहे हैं गर्मी ले रहे हैं जो सूर्य प्राणी मात्र को लाभ पहुंचा रहा है, जो सूर्य हमें देने के कारण वह हम सबका देवता है उसे नमस्कार करना तो शिर्क हो गया | संगे असवाद को चूमना क्या है ? कहीं किसी का नाम व निशान नही है उसे शैतान समझ कर कंकड़ मारना क्या है ? अल्लाह के नाम के साथ मोहम्मद का नाम को जोड़ना क्या है, इनमें कुल मिला कर भारत का विरोध करना |
हिन्दुत्व का विरोध करना ही इनका मकसद रहा है जिसपर यह अमल करते आ रहे हैं | सही में जो लोग अपने को सेकुलर वादी बने हुए हैं वह भी मौन है, मुसर्रत पर किसी ने कुछ नही बोला वह किस लिए ? बलके उसके भारत विरोधी गति विधिमें मौलाना अग्निवेश मुसर्रत के समर्थन में जा खड़े हुए, यह भारत विरोधी नही तो और क्या हैं ? अब हम लोग सही जगह पर खड़े हैं यही अवसर है की हमलोग भारत विरोधिओं को पहचाने, और उन्हें भारत से निकालने के प्रयास में हर भारत वासिओं को एक जुटता दिखानी चाहिए तभी हम भारत माँ की लाज की रक्षा कर सकते हैं जो हम भारत वासियों का परम दायित्व तथा कर्तव्य भी है | आयें हम सब मिलकर इस काम को जिम्मेदारी के साथ निभाने का संकल्प लें |

आरक्षण :वरदान या अभिशाप ??

भारतीय संविधान में आरक्षण की व्यवस्था का श्रेय बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी को जाता हैं. डॉ अम्बेडकर द्वारा दलितों के उत्थान के लिए किये गए कार्यो के लिए दलित समाज सदैव उनका ऋणी रहेगा लेकिन आज क्या आरक्षण की उपयोगिता हैं? क्या वाकई में ये दलितों के उत्थान में कारगर हुआ हैं? क्या इससे प्रतिभासाली बच्चो का शोषण नहीं हो रहा हैं? क्या वास्तव में आरक्षण देश के विकास में बाधक हो रहे हैं? आज आजादी के 68 साल बाद इन सभी सवालों पर विचार करने की जरुरत हैं क्युकी आरक्षण का लाभ कुछ परिवारों को ही मिल पा रहा हैं जैसे एक दलित परिवार में कोई बाबू बन गया तो फिर वो सिर्फ अपने परिवार को ही प्रमोट करता हैं वही पूरा दलित समाज आज भी वही खड़ा है जहा आज से 68 साल पहले खड़ा था.आरक्षण से क्या पुरे दलित सम्माज को प्रतिनिधित्व मिल जाता हैं मान लो मिल भी जाता हैं तो क्या वो उसका समुचित लाभ पूरा शोषित समाज उठा पाता हैं क्योंकी प्रथमतया उनमे ज्ञान की कमी होती हैं क्युकी उन्हें मिला हुआ पद उनकी योग्यता पर नहीं बल्कि आरक्षण पर मिला हैं. ऐसे व्यक्ति के हाथ में देश की कमान अर्थात विकास व् सुशासन की जिम्मेद्दारी किस प्रकार दी जा सकती हैं क्योंकी वह सदैव एक जाति समूह में बंधा रह जाता है जिससे रास्त्र को नुक्सान पहुचता हैं इससे समाज में विद्वेष की भावना का विस्तार होता हैं उदाहरण के रूप में बिहार के लालू प्रसाद यादव जी हैं जिन्होंने जात पात और आरक्षण की राजनीति कर के बिहार को 50 साल पीछे कर दिया हैं. जिससे उग्रवाद,नक्सलवाद जैसे संगठनो का जन्म होता हैं. आरक्षण का सबसे बड़ा दुष्परिणाम ये हैं की इससे प्रतिभावान छात्रों का शोषण होता हैं.एक व्यक्ति जिसने अव्वल प्रतिभा का प्रदर्शन किया परन्तु उसका चयन सिर्फ इसलिए रोक दिया जाए की वो सवर्ण हैं किस हद तक न्यायोचित हैं? हमारे राजनीतिज्ञ आरक्षण की वकालत करते हैं लेकिन जब कोई सर्जरी या ऑपरेशन करनी होती हैं तो विदेश में जाते है क्योंकी वो जानते हैं की उन्होंने जो डॉक्टर की फौज खड़ी की हैं वो तो आरक्षण की फसल हैं.इसके विपरीत प्रतिभावान छात्र जिनमे आसमान छुने की काबिलियत और कुछ कर गुजरने का हुनर होता हैं उनकी प्रतिभा को दबा दिया जाता हैं. परिणामस्वरूप वो अपने मार्ग से विमुख हो जाते हैं.जिस कारण देश में अपराध बढ़ते हैं अपने देश की गन्दी राजनीती का परिणाम होता है की उनमे से देश के प्रति प्रेम कम होने लगता हैं. इससे वो स्वहित को देशहित से ज्यादा तरजीह देने लगते हैं. हमारे राजनेता महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं उन्हें पुरुषो को समकक्ष खड़ा करने की बात करते हैं. वे पुलिस आर्मी सभी में उनके किये दरवाजे खोल रहे हैं पुरुष के लिए दोड़ 5 km हैं वही महिलाओ के लिए 3 km हैं साथ उनकी समय सीमा भी ज्यादा होती हैं. सभी जानते हैं की महिलाओ में पुरुष सा बल और धेर्य नहीं होता हैं साथ ही उनका शारीरिक संघटन भी पुरुषो के सामान नहीं होता हैं. मेरा प्रश्न यह हैं की अपराधी अपराध कर के भागेगा तो क्या वो महिला पुलिस को ज्यादा मौका देगा या धीरे धीरे भागेगा. देश की सुरक्षा में राजनीति नहीं करनी चाहिए. मैं महिलाओ की छमता को कम नहीं आक रहा हूँ बस उनकी उर्जा को सही दिशा में लगाने की बात कर रहा हूँ . 
बाबा साहब ने जिस समय संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की थी उस समाया उनका लोकतंत्र पर शंका करना लाजिमी था परन्तु भारत का लोकतंत्र विश्व की सबसे सबल लोकतंत्र में एक हैं ,जिसमे किसी के अधिकारो का हनन नहीं होता हैं. मैं मनाता हु की हमारे देश में दलितों का बहुत शोषण हुआ हैं, बहुत तरीके से उन्हें प्रताड़ित किया गया हैं. उनके सरंक्षण के लिए कठोर से कठोर नियमो व कानूनों का पक्षधर हूँ. दलित समाज व कमजोर वर्ग को सिक्षा के अधिक अवसर मिलने चाहिए साथ ही छात्रवृति व आवासों के माध्यमो से उन्हें और प्रोत्साहित करना चाहिए. उन्हें इस लायक बनाना चाहिये की वो मुख्यधारा से जुड़े न की आरक्षण की बैसाखी पकडाकर विश्व की दौड़ में दौड़ा दे ऐसे में हमारा हारना तो तय हैं. हमारे राजनेता अपनी राजनीति चमकाने के लिए समाज को बाटने के लिए आरक्षण की राजनीति करते हैं. हमारे बीच जातिवाद सम्प्र्यवाद जैसे बीजो को बोकर आपस में सत्ता का हस्तातरण करते हैं. वे समाज के सबसे पीछे खड़े व्यक्ति के विकास की बात करते हैं ,उनके मतों से सत्ता पर काबिज होते हैं फिर उन्ही का खून चूसकर अपनी तिजोरिया भरते हैं. उधाहरण के रूप में हम बहन मायावती को ही लेते हैं वो खुद को दलितों का सबसे बड़ा हिमायती बताती हैं और तीन बार उत्तर प्रदेश की सत्ता संभाल चुकी हैं लेकिन आज तक उन्हों\ने दलितों के उत्थान के लिए क्या किया वो सोच से परे हैं लेकिन हा उनके आय में उनके रहन सहन में उनके बंगले में जरुर विकास हुआ हैं लाखो के चप्पल पहनती हैं 200 करोड़ के बंगले में रहती हैं वही उनके आय में बेतहाशा वृद्धि हुई है जिसे छिपाने के लिए समय समय पर दलितों के अधिकारों को बेच देती हैं..आरक्षण वास्तव में किसको लाभ पहुचा रहे हैं? ये समाज को बाट रहे हैं साथ ही आपस में जहर घोल रहे हैं. इससे शिक्षित बेरोजगारों की संख्या में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हो रही हैं जो देश के सुनहरे भविष्य के खिलाफ हैं.. वास्तव में आरक्षण का लाभ मुट्ठीभर दलित ले रहे हैं ऐसे में इसकी पुनः समीक्षा होनी चाहिये जिसमे या तो आरक्षण आर्थिक पर होना चाहिये या तो ये होना चाहिये की एक बार जिस परिवार को आरक्षण का लाभ मिल गया उसे दोबारा आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिये ऐसे में आरक्षण का लाभ सभी लो मिल सकेगा जिसे बाद में पूर्ण रूप से ख़त्म कर देना चाहिये.... 

दशानन की उपेक्षा क्यों ?

हमारे देश में रावण को अधर्म और असत्य का दूसरा रूप मानते हैं. समाज में गलत करने वालो को रावण की संज्ञा दी जाती हैं लेकिन क्या वास्तव में वो इतना बुरा था, शायद नहीं क्योकी रावण एक परम ज्ञानी, महान शिवभक्त, अच्छा शासक और वीर योद्धा था जिसने पूरी पृथ्वी को जीतने की कोशिश की. समाज उसे अहंकारी होने का आरोप लगाती हैं लेकिन मेरे नजर में उनकी वो हठ सिर्फ अपनी और अपने परिवार की मुक्ति के लिए किया था. रावण ने सीता को लंका में लम्बे समय तक रखा लेकिन कभी उनके साथ अनैतिक काम करने की कोशिश नही की. ये इस बात का प्रमाण हैं कि रावण एक दूरदर्शी शासक था जिसने अपने पूरे परिवार को मुक्ति दिलाने के लिए पूरी योजना बनाई.वही हमारे मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जिन्हें सत्य और धर्म की मूर्ति मानते हैं. भले ही वो एक अच्छे पुत्र, शासक, और राजा रहे हो लेकिन वो एक अच्छे पिता और पति नहीं थे क्योंकी उन्होंने सीता की अग्नि परीक्षा लेकर अपनी पुरुषवादी मानसिकता को साबित किया था भले ही तुलसीदास ने राम को सही सिद्ध करने के लिए लाख तर्क दिये हों, क्योकि रावण को मारने के बाद ली गयी अग्निपरीक्षा के लिए किसी धोबी ने बाध्य नहीं किया था वो उनका खुद का फैसला था जो कही ना कही उनकी पुरुषवादी मानसिकता को दर्शाता हैं..

भारतीय संस्कृति में महिलओं की स्तिथि

हमारे संस्कृति की बड़ी विडम्बना हैं की एक तरफ हम महिलाओ को शक्ति और वत्सल का रूप मानते हैं. मातृदेवी के रूप में उनकी पूजा करते हैं साथ ही सभी देवताओ के नाम से पहले देवी का नाम बोलते हैं जैसे- राधेश्याम, सीताराम, पार्वतीशिव. लेकिन वही दूसरे तरफ रामायण युग से ही महिलाओ को ही अग्निपरीक्षा देनी पड़ रही हैं. पुरुष महिला के संघर्ष में हमेशा महिलाओ को ही झुकना पड़ता हैं. हर युग में औरत को ही अपनी पवित्रता क्यों सिद्ध करनी पड़ती हैं? अहिल्या को शिलाखंड में परिवर्तित कर दिया गया उस गलती के लिए जो उन्होंने की ही नहीं थी. इंद्र ने उनके पति का रूप बनाकर उनके साथ गलत किया तो उसमे अहिल्या को सजा क्यों ? सीता को रावण हर कर ले गया तो सीता की अग्निपरीक्षा क्यों ? अगर एक राजा का धर्म प्रजा की शंका दूर करना हैं तो एक पति का भी फर्ज हैं की वो अपनी पत्नी का साथ दे न की उसका साथ छोड़ दे क्योकी पति के दिये सात वचनों के भरोसे ही एक लड़की अपना घर बार छोडकर दूसरे घर जाती हैं. 
आज सदियों बाद सबकुछ बदल चुका हैं लेकिन महिलाओ की स्तिथि अब भी वैसी ही हैं. आज हर घर में महिलाओ का शोषण हो रहा हैं की दहेज़ के नाम पर तो कही अपने कामुकता के नाम पर. आज हर चोराहे पर रावण हैं जो नजरो से रैप करते हैं लेकिन इस युग में न राम हैं और ना हनुमान. ऐसे में हर लड़की को खुद ही दुर्गा और काली बनना पड़ेगा.. हां ये जरुर हैं की इन्ही महिलाओ में ही कुछ ऐसे विभीषण भी हैं जिन्होंने महिलाओ की छवि खराब की हैं जो महिलाओ को मिले अधिकारों का दुरुप्रयोग करती हैं.. लेकिन अपवाद हर जगह होते हैं लेकिन इसका मतलब ये नहीं हैं की महिलाओ की स्तिथि में थोडा भी सुधार हुआ हैं..